“आपके जैसा मैं फ़नकार कहां से लाऊं aapke jaisa mein fankar kahan se laun

उनके  कूंचे   से   यूं   गुज़र   रक्खा।
ख़ौफ़ दिल में न कुछ ख़तर रक्खा।

आमद ए फ़सले गुल की चाहत में ।
अपनी आंखों को मुन्तज़र रक्खा।।

तूने बख़्शा किसी को शीशमहल।
मेरे हिस्से में  क्यों  खन्डर  रक्खा।।

उसकी बख़्शिश हो क्या ताज्जुब है।
दिल में जिसने खुदा का डर रक्खा।।

ये भी कुदरत का इक करिश्मा है।
“उसने  सूरज  ज़मीन पर  रक्खा”

मुझको गै़रत झिंझोड़ती  ही रही।
जब महाजन के पास घर रक्खा।।

ये इनायत है उसकी ‘गुलशन’ पर।
फूल  मुझको  उधर  समर रक्खा।।

आईना ए गुलशन 46 गुलशन ख़ैराबादी

हक़ीक़तों के सिवा कुछ नहीं  हूं यार मुझे।
तू देख सकता है शीशा हूं आर पार मुझे।।

ख़जां  के  बाद  चमन  में  बहार  आई   है।
चले भी आओ कि अब तक है इन्तज़ार मुझे।।

मैं  जानता  हूं  मिले  हैं ये सब  मोहब्बत में।
कि दिल में ज़ख़्म हैं कितने नहीं सुमार मुझे।।

किया है तर्क ए तअल्लुक़ ये और बात मगर।
बिछड़ के  तुझसे मिलेगा  कहां  क़रार मुझे।।

जिसे ख़बर नहीं इस दिल पे क्या गुज़रती है।
न जाने किस लिए उसका है इन्तज़ार मुझे।।

चला तो आया मैं उठ कर तुम्हारे दर से मगर।
मेरा   ज़मीर  पुकारे  गा    बार  बार    मुझे।।

नसीब अपना इनायत किसी की क्या कहिए।
न रास आया जो ‘गुलशन’ का कारोबार मुझे।।

आईना ए गुलशन…47…गुलशन ख़ैराबादी

जाऊं कहां कोई मुझे इतना बताए तो।
“तेरी हर एक बात मेरा दिल दुखाए तो”

कैसे जिऊंगा ये तो बता दे ज़रा मुझे।
तेरे बग़ैर दिल न कहीं चैन पाए तो।।

खाई है मैंने जो भी क़सम तोड़ दूंगा मैं।
नज़रों से अपनी आज अगर वो पिलाए तो।।

दामन में अपने लालो गुहर भरके लाएगा।
पहले वो तह में गहरे  समन्दर के जाए तो।।

कहता है कौन दिल की वो सुनता नहीं है बात।
अल्लाह  के  हुजूर  कोई   गिड़गिड़ाए तो।।

समझा था जिसको अपने बुढ़ापे की मैं उम्मीद
वो शख़्स मुझको ख़ून के आंसू रुलाए तो।।

‘गुलशन’ महक रहा है खिली है कली कली।
भौंरे  का  क्या  कसूर  कहीं बैठ जाए तो।।

आईना ए गुलशन…48…गुलशन ख़ैराबादी

हुस्न ए यूसुफ़ के ख़रीदार कहां से लाऊं।
मिस्र के जैसा वो  बाज़ार कहां से लाऊं।।

ढूंढ  कर  साहिबे  क़िरदार कहां से लाऊं।
अपने जख़्मों का तलब गार कहां से लाऊं।।

शब का सैलाब बहा ले गया सब कुछ अब के।
ताक़ ओ क़िन्दील  वो  दीवार  कहां से लाऊं।।

मैं  तो  इंसान  हूं  इंसान  फरिश्ता  तो  नहीं।
पाक  दामन  मेरे  सरकार  कहां  से  लाऊं।।

गर्दिश  ए  वक्त़ के  झोंकों  में  बताएं कोई।
मीर  सा  पैकर ओ अफ़कार कहां से लाऊं।।

छोड़कर जा तो रहे हो मुझे तन्हा ऐ दोस्त।
“आपके  जैसा  मैं  फ़नकार  कहां से लाऊं”

शाख़े हिजरां पे कोई गुल है न पत्ता ‘गुलशन’
है ख़ज़ां अब गुल ओ गुलज़ार कहां से लाऊं।।

आईना ए गुलशन….49…गुलशन ख़ैराबादी

हूं  जो  कांटा  मुझे  रास्ते  से हटा कर देखो।
ओर अगर फूल हूं बालों में सजा कर देखो।।

मुन्तज़िर हैं मेरी आंखें भी मेरे दिल की तरह।
न  यक़ीन आए तो इनमें कभी आ कर देखो।।

मैं  ज़माने  में  कभी  सर   न   उठा    पाऊंगा।
मुझको नज़रों से किसी रोज़  गिरा कर देखो।।

इस बहाने ही रहे लुत्फ़ ए हुजूरी  हासिल।
कोई  इल्ज़ाम  मेरे सर भी लगा कर देखो।।

अज़्म  तामीर का बाकी है अगर दिल में कोई।
आशियां   तेज़  हवाओं  में  बना  कर  देखो।।

इम्तिहां  मेरी   वफा़ओं  का  अगर  है  मंजूर।
अपनी महफ़िल में कभी मुझको बुला कर देखो।।

नाज़ है अपनी निगाहों पे अगर कुछ ‘गुलशन’
उनकी  तस्वीर  को आंखों में बसा कर देखो।।

आईना ए गुलशन….50…गुलशन ख़ैराबादी

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