ऐसा हिंदुस्तान बना दे या अल्लाह। Aisa Hindustan Bana de ya Allah

    क़ता तारीख़ तसनीफ़
                     “आईना ए गुलशन”
                मुसन्निफ़ गुलशन ख़ैराबादी
                       नतीज़ा  ए  फ़िक्र
             मुफ़्ती इलियास ‘ताइब’ ख़ैराबादी

इदराक  के   साए  में  एहसास  के  आंगन  में।
जज़्बात ए मोहब्बत हैं अल्फ़ाज़  के दामन में।।
इस  तरह  इशाअत  की तारीख़ लिखो ‘ताइब’।
है रक़्से ए ग़ज़ल अच्छा आईना ए गुलशन में।।
                         2018 ईस्वी

    आईना ए गुलशन 24 गुलशन ख़ैराबादी

                      हम्दिया गीत

रौशन  है  चांद नूर से पुर आफ़ताब है।
           रब्ब ए करीम तेरा  करम बे हिसाब है।।

तेरा  ही  नाम  लेता  है ‌ दीवाना  जो  हुआ।
तुझपर जो हो गया है दिलो जान से फ़िदा।
दुनिया  में  सिर्फ़  ऐसा  बशर कामयाब है।
          रब्ब ए  करीम  तेरा   करम  बे हिसाब है।।

सत्तार  भी  है  तू  ही तो ग़फ़्फ़ार भी है तू।
मुश्किल कोई पड़े  तो  मददगार भी है तू।
बेशक निगाहो दिल में तू ही  इन्तख़ाब है।
          रब्ब ए  करीब  तेरा  करम बे  हिसाब है।।

ता  हशर  इसमें  होगी न तरमीम दोस्तो!
करना है हमको हर घड़ी ताज़ीम दोस्तो!
कुरआन वो जहां में मुकम्मल किताब है।
            रब्ब ए  करीम  तेरा  करम  बे हिसाब है।।

दरिया में आब सार में तू किस जगह नहीं।
ज़र्रे  में  कोह सार  में  तू किस जगह नहीं।
इस ‘गुलशन’ ए जहां का तू ही एक बाब है।
            रब्ब ए  करीम  तेरा   करम  बे हिसाब है।।

    आईना ए गुलशन 25  गुलशन ख़ैराबादी

               दुआ बारी तआला

दुनिया को गुलज़ार बना दे या अल्लाह।
रंग  बिरंगे  फूल  खिला दे या अल्लाह।।

यार  का  तू   दीदार  करा  दे या अल्लाह।
ईद का मुझको चाँद दिखा दे या अल्लाह।।

ईद  की  ख़ुशियाँ  और  बढ़ा दे या अल्लाह।
बिछड़ो को फिर आज मिला दे या अल्लाह।।

मिलने  को  हम  उनसे   हैं   बेताब   बहुत।
कश्तिये ख़्वाहिश पार लगा दे या अल्लाह।।

बरसों   से  उम्मीद  पे  जिसकी   जीते हैं।
वहदत का वो जाम पिला दे या अल्लाह।।

जो  भी  तेरी  राह  से   भटके हैं अब तक।
उनको  सीधी  राह  दिखा दे या अल्लाह।।

छोड़  के  नफ़रत एक रहें सब ‘गुलशन’में।
ऐसा   हिंदुस्तान   बना   दे  या  अल्लाह।।

आईना ए गुलशन 27  गुलशन ख़ैराबादी

                        नात पाक

खुली आंखों से मैं देखूं कभी जलवा मोहम्मद का।
“सजा रखा है कब से दिल में गुलदस्ता मोहम्मद का”

जिसे सुनते थे बरसों से वही दिल की तमन्ना है।
कभी देखेंगे हम भी वो हसीं रौज़ा मोहम्मद का।।

इसी  की  रौशनी  फैली  रहेगी  दीन  ओ  ईमां पर।
अगर क़ुरआन है दिल में तो है तोहफा़ मोहम्मद का।।

उजाला  ही  उजाला हर तरफ़ फैला है आलम में।
नज़र  आता  है  ज़र्रे ज़र्रे में जलवा मोहम्मद का।।

कहां क़ौसैन की मंज़िल कहां जिब्रील सिदरा तक।
ख़ुदा से बढ़के क्या समझे कोई रुतबा मोहम्मद का।।

ब रोज़े हशर क्या रोकेगा रिज़वां बाबे जन्नत पर।
कहेगा जा कि है तू भी तो दीवाना मोहम्मद का।।

मेरी  नज़रों  में  वो  नादान  है  अन्जान  है ‘गुलशन’।
नहीं समझा यहां जिस शख़्स ने रुतबा मोहम्मद का।।

  आईना ए गुलशन 28 गुलशन ख़ैराबादी

जिसको देखो उदास हो जैसे।
कोई  टूटी  सी आस हो जैसे।।

दश्ते तनहाई में भी लगता है।
वो  मेरे  आस-पास हो जैसे।।

एक  मुद्दत  से उसके होठों पर।
तपते सहरा की प्यास हो जैसे।।

हर नफ़स में हुआ यही महसूस।
तू  ख़्यालों  में  पास   हो  जैसे।।

उसके  अल्फ़ाज़  में  है शीरीनी।
गुफ़्तगू  में  मिठास  हो  जैसे।।

बुल हवस क्या है मेरी आंखों में ।
कोई  ख़ाली  गिलास  हो  जैसे ।।

ओढ़ लेता हूं शाम से ‘गुलशन’।
याद उसकी लिबास हो जैसे।।

आईना ए गुलशन 139 गुलशन ख़ैराबादी

राह  तकती   रही   ज़िन्दगी।
लौटकर वो न  आया  कभी।।

देख कर उनकी दरिया दिली।
शैख़  भी  माइल ए मयकशी।।

जब भी ठोकर लगी राह में ।
ऐ  ख़ुदा  याद   आई   तेरी।।

उनसे बिछड़े ज़माना  हुआ।
याद ताज़ा है अब भी वही।।

फिर छलकने लगे अश्के ग़म।
फिर मुझे याद आया कोई।।

जिस घड़ी रुख़ से पर्दा उठा।
फैलती   ही   गई    चांदनी।।

जब  भी  ‘गुलशन’ अकेले हुए।
याद     आई    तेरी       दोस्ती।।

आईना ए गुलशन 141 गुलशन ख़ैराबादी

उसी पे वक़्त की आंधी का भी असर कुछ था।
घना निगाह ए मोहब्बत में जो शजर कुछ था।।

यही  तो  दर्द  ए  मोहब्बत   है  मेरी  यादों  में।
जो  तेरे  साथ में गुज़ारा  वही  सफ़र कुछ था।।

निदामतों से  गिरा था  जो  उस के दामन पर।
वो अश्क  मेरी  निगाहों  में  मोतबर  कुछ था।।

अलग मक़ाम था ग़ालिब का दाग़ का अपना।
ज़ुबान  एक थी लेकिन बयां  दिगर  कुछ था।।

सभी  को आप  ने सैराब कर  दिया  लेकिन।
जो  मेरे  साथ  चला दौर मुख़्तसर कुछ था।।

मैं  पढ़  रहा  था  बड़े  ग़ौर  से  कोई  चेहरा।
“मेरे कलाम का उस पर कहीं असर कुछ था”

हुजूम  ए शहर में  देखा है जब भी ए ‘गुलशन’।
वो जिसकी बात अलग थी वही बशर कुछ था।।

आईना ए गुलशन143  गुलशन ख़ैराबादी

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