बढ़ते हुए क़दम भी हैं कुछ डगमगा रहे। Badhte hue kadam bhi hain kuchh Dagmaga rahe

आईना ए गुलशन 11 गुलशन ख़ैराबादी
                        अपनी बात
मेरा नाम अशफ़ाक अली है तख़ल्लुस की जगह गुलशन खै़राबादी इस्तेमाल करता हूं।
मेरी पैदाइश 9 अक्टूबर 1964 ईस्वी को मुजाहिद ए आज़ादी अल्लामा फ़ज़ले हक़ खै़राबादी के मोहल्ला शेख़ सराय खै़राबाद अवध में हुई वालीदैन ने बड़े नाज़ से मेरी परवरिश की और मेरी तालीम के लिए मेरा दाख़ला नियाज़िया जूनियर हाई स्कूल मोहल्ला मियां सराय खै़राबाद में करवा दिया जहां पर मैंने इब्तिदाई
तालीम हासिल की और वहीं से हाई स्कूल पास किया और फिर पढ़ाई रोकनी पड़ी क्योंकि मेरा ताल्लुक़ ग़रीब ख़ानदान से था इसलिए  तालीम हासिल करने के बाद मैंने बाक़ायदा तौर पर कारोबार की तरफ ध्यान दिया मैंने कढ़ाई मशीन का काम सीखा अभी काम कर ही रहा था कि मेरे वालिद मोहतरम शाकिर अली का इंतकाल हो गया और फिर सारी जिम्मेदारी मुझपर आएद हो गई क्योंकि हम सात भाई और हमारी दो बहनें हैं बड़े भाई का नाम मुश्ताक़ अली और मेरा नाम अशफ़ाक़ अली फिर मुझ से छोटे अख़लाक़ अली लियाक़त अली इसके बाद  बहन शहनाज़ बानो और दूसरी बहन गुलनाज़ बानों के बाद फिर छोटे भाइयों में शराफ़त अली शहादत अली रियासत अली जो कि सबसे छोटा भाई है।
चूं कि हमारी मां ने हम यतीमों को बड़े जतन से पाला पोसा परवरिश की और हम लोगों को इस मुकाम तक पहुंचाने में हमारी मां का अहम रोल है। और मां की दुआओं से हम सब लोग अपना काम कर रहे हैं।
मैंने अपना काम गुलशन कढ़ाई सेंटर के नाम से लतीफ़ मार्केट ख़ैराबाद में शुरू किया और  अल्लाह ताला के करम से कारोबार में बरकत अता फ़रमाई और मैं दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता रहा और अपनी तालीम अलीगढ़ जामिया उर्दू के ज़रिए हासिल करता रहा क्योंकि शेरो शायरी का शौक़ मुझे बचपन से था इसलिए मैंने शेर ओ सुख़न की राह पर क़दम  1984 में बाकायदा तौर पर रखने के लिए मैं अपने उस्ताद मास्टर यक़ीन अहमद तिर्मीजी से मिला और अपना टूटा फूटा कलाम उनकी ख़िदमत में पेश किया जिन्होंने बड़ी मोहब्बत से ख़ुश आमदीद कहा और मेरी ग़ज़लों की इस्लाह फ़रमाई और फ़न ए शायरी की तमाम तराकीब से रूशनास  फ़रमाया और  शेर गोई के तौर-तरीके़ सिखाए।
मैं उनका बे हद मम्नून व मशकूर हूं।लेकिन अफ़सोस कि ज्यादा दिनों तक उस्ताद का साया मेरे सर पर न रह सका और वो अपने माबूद ए हकी़की़ से जा मिले अल्लाह उन्हें अपनी रहमत से उनकी क़ब्र को नूर से भर दे। आमीन
मेरे दिल में शायरी का शौक़ और जज़्बा मुशायरों से पैदा हुआ मुझे अपनी पहली ग़ज़ल की कुछ शेर आज भी याद हैं  दो अशआर पेश ए ख़िदमत हैं।
मुलाहिजा़  फरमाएं।

मायूसीयों   की   राह  अंधेरे  से  छा रहे ।
बढ़ते हुए क़दम भी हैं कुछ  डगमगा रहे।।
किसको पुकारे हम कोई हमदम नहीं रहा।
जितने भी हमनवा थे सभी  दूर  जा  रहे।।
गुलशन खै़राबादी

मैं अगर अपने अज़ीज़ दोस्तों का ज़िक्र न करूं तो बड़ी नाइंसाफी़ होगी मेरे अज़ीज़ दोस्त जमशेद अली अंसारी कस्बाती टोला खै़राबाद सीता पुर। मैं इन का ज़िक्र करना लाज़मी समझता हूं क्योंकि उन्होंने ही मुझे शायरी की तरफ़ राग़िब किया इनके अलावा मेरे दोस्त आरिफ़ अली अंसारी, मोहम्मद उस्मान सीनियर, मजाज़ सुल्तानपुरी, हसन सरौरवी, नसीमुद्दीन नसीम अंसारी  ,वसी अहमद खै़राबादी, अशफ़ाक अंसारी, अबसार हुसैन काज़मी, फुरकान हाशमी, दरगाह असलमी के सज्जादा नशीन , कलीम अहमद अंसारी ,रज़ी गौरी, शैदाई साहब , साजिद खै़राबादी, मिलन खै़राबादी, जिया अल्वी ,मस्त हाफ़िज़ रहमानी, ज़िया अंसारी, नफी़स खै़राबादी, घायल खै़राबादी, मरहूम रईस ख़ां, तसद्दुक़ खै़राबादी ,रहबर खै़राबादी
मोहतरम गौहर खै़राबादी, अनवार सीतापुरी, मुबीन अल्वी ,शौकत खै़राबादी, हसन अहमद हसन खै़राबादी, सज्जादा नशीन छोटे मख़दूम साहब खै़राबाद, जुंबिश खै़राबादी ,रशीद अहमद, जाकिर  खै़राबादी ,मोहतरमा रिहाना आतिफ़ ख़ैराबादी , ऐनुल हक़ अनवर खै़राबादी, ।
नफी़स खै़राबादी, और मजाज़ सुल्तानपुरी, हमारे मुख़लिस दोस्तों में हैं मैं हमेशा उनको अपना भाई मानता हूं उस्ताद मोहतरम के इंतकाल के बाद मैं ने शायरी को अलविदा कह दिया कुछ अर्शे के बाद आरिफ़ अली बुक सेलर के कहने पर अपने अश्आर मजाज़ सुल्तानपुरी साहब को दिखाता रहा और कुछ अर्शे  बाद मजाज़ सुल्तानपुरी के मशवरे पर  मैंने अपने उस्ताद मोहतरम जनाब डॉ अज़ीज़ खै़राबादी साहब को अपने अश्आर दिखाना शुरू किया  जिन्होंने मुझे हमद ,नात, ग़ज़ल  वगै़रा कहने के का़बिल बनाया ।
अल्लाह तबारक व ताला हमेशा  उनका साया मेरे सर पर क़ायम व दायन रखें मैं हमेशा उनका शुक्र गुज़ार  रहूंगा।
मेरी शायरी का सिलसिला जारी व सारी है ।
उन्हीं की वजह से और मेरे दोस्तों की मेहरबानी से  बज़्में गुलशन उर्दू सोसायटी खै़राबाद सीतापुर के नाम से कायम व दायम है। और हर महीने की 15 तारीख़ को बा का़यदा तरही व ग़ैर नशिस्त का इनका़द होता रहता है और सब शायर बा कायदा आते रहते हैं।

मेरे तमाम दोस्त जैसे अनवार सीतापुरी गौहर खै़राबादी मुफ़्ती इलियास तायब  ख़ैराबादी, नफी़स अंसारी खै़राबादी, मजाज़ सुल्तानपुरी, मास्टर निसार अहमद निसार अंसारी, डॉ महबूब ख़ैराबादी ,क़ारी मोहम्मद आज़म जहांगीराबादी, अतहर कमलापुरी, हाफ़िज़ मसूद आलम महमूदाबादी, मरहूम सलीम अख़्तर  अख़लाक़ हरगांवीं, साजिद खै़राबादी , शाकिर खै़राबादी रिज़वान अंसारी रिज़वान खै़राबादी इरफ़ान खै़राबादी क़मर खै़राबादी शफा़अत खै़राबादी वसीम खैराबादी विवेक मिश्र राज़ खै़राबादी नदीम सीतापुरी दिलीप कुमार दिल बाराबंकवी राजेंद्र प्रसाद रंचक  ख़ैराबादी, इक़रार खै़राबादी अख़्तर मुजीबी रईस रहमानी ,आज़र खै़राबादी , जैद खै़राबादी नफी़स सीतापुरी, इक़बाल अकरम वारसी, मरहूम रईस खीरवी, मेरे दोस्तों में हैं और ये सब मेरी हौसला अफ़जाई फ़रमाते रहते हैं।
इसमें मेरे घर वालों का सबसे ज्यादा ताऊन है जिसमें मेरी शरीके हयात कनीज़ फा़तिमा और मेरे बेटे मोहम्मद शादाब गुलशन व मोहम्मद नायाब गुलशन खै़राबादी और मेरे भाई साजिद खां असोडर खै़राबादी इन सब की वजह से मैं अपना शेरी मजमुआ ‘आईना ए गुलशन’  को मंज़रे आम पर लाने की जसारत कर सका मैं अपना पहला शेरी मजमुआ  ‘आईना ए गुलशन’ कारईन के ख़िदमत में पेश करने की सआदत हासिल कर रहा हूं।
जो कि अब आप के हाथों में है।
उम्मीद है कि आप हज़रात मेरी हौसला अफ़जा़ई  फरमाएंगे ।
फ़क़त आपका मुख़लिस दोस्त
अशफ़ाक अली गुलशन खै़राबादी
शेख़ सराय ख़ैराबाद सीतापुर उत्तर प्रदेश 261131
दुकान शादाब गुलशन लतीफ़ मार्केट खै़राबाद सीतापुर उत्तर प्रदेश
9807307077

आईना ए गुलशन 11=14  गुलशन ख़ैराबादी

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