बेताब जिसे दिल में बिठाने के लिए था Betaab jise Dil mein bhi Thane ke liye tha


दिल पे जो नक़्श  हैं ज़माने से। 
कब मिटे  वो कभी मिटाने से।।

कितना जां बख़्श था वो मंज़र भी।
भूलता   ही    नहीं    भुलाने    से।।

आज हासिल हुआ सुकूं दिल को।
इक  तेरे  दर  पे  सर  झुकाने  से।।

आख़िरस मिल गया मुझे साहिल।
उनकी  आंखों  में  डूब  जाने  से।।

होगी इस्लाह क़ौमो मिल्लत की।
सोए  ज़हनों को  अब जगाने से।।

गुंचा ए आरज़ू खिला आख़िर।
आज  फिर  तेरे  मुस्कुराने  से।।

दौलत ए इल्म बाट ऐ ‘गुलशन’।
ये तो  घटती  नहीं  ख़ज़ाने से।।

आईना ए गुलशन  96 गुलशन ख़ैराबादी

हम  तो  रहीनें  गर्दिश  ए  लैलो  निहार हैं।
क्यों आज आप किसके लिए अश्क बार हैं।।

इक तू है जिसने हमको फ़रामोश कर दिया।
इक  हम  कि  तेरे  इश्क़  में  ही  बेक़रार हैं।।

क्या  हाजत ए रफ़ू नहीं अब उनको दोस्तो।
दामन  जो  ज़िन्दगी  के  यहां  तार-तार हैं।।

कुछ बात है जो तुझ पे नज़र डालता हूं मैं।
“वैसे   तो   मेरे   चाहने   वाले  हज़ार   हैं”

आंखें  वो आज  बन्द किए  हैं  कमाल है।
कहते हैं जिनको लोग बड़े हक़ निगार हैं।।

इक दूसरे के हाल से वाक़िफ़ हैं सब के सब।
मोबाइलों   के  दिल  से  जुड़े   ऐसे  तार  हैं।।

‘गुलशन’ निगाहे  हुस्न  से  देखे   कोई  हमें।
हम आज भी  तो  मंज़रे  फ़सले  बहार  हैं।।

आईना ए गुलशन   97   गुलशन ख़ैराबादी

दामने दिल कभी जो नम होगा।
दोस्तों  का  कोई  करम  होगा।।

आंखों आंखों में रात गुज़रेगी।
तेरे आने का जब भरम होगा।।

जूए  ख़ूं  होगी चश्में तर से  रवा।
जब कोई  मायले  सितम होगा।।

जिस जगह होगा उनका नक़्शे क़दम।
सर   वहीं   पर   हमारा  ख़म   होगा।।

उसकी  तक़दीर   जाग   उटठे  गी।
जिस पे  भी आप का करम होगा।।

आया होगा जो आपके दर तक।
वो यक़ीनन ही मोहतरम होगा।।

शेर  तब  शेर   होगा  ऐ  ‘गुलशन’।
फ़िक्र ए  तख़्ईल का करम होगा।।

आईना ए गुलशन  98  गुलशन ख़ैराबादी

बे ताब जिसे दिल में बिठाने के लिए था।
वो मुझको ज़माने से मिटाने के लिए था।।

गूंजी थी अनल हक़ की सदा जिसकी बदौलत।
पैग़ाम  ए  सदाक़त  वो  ज़माने  के  लिए  था ।।

सब चाहने  वाले थे तेरे शहर  ए  तरब में।
क्या मैं ही तेरे ग़म को उठाने के लिए था।।

दुनिया की चकाचौंध में भटका जो मुसाफ़िर।
बस  तू  ही  उसे  राह  दिखाने  के  लिए  था।।

कुछ और न उसके सिवा हाथ आया किसी के।
तक़दीर  का लिक्खा ही ज़माने  के  लिए था।।

इक बार जो बिछड़ा तो दोबारा न मिला वो।
दिल में   जिसे  मेहमान बनाने के लिए था।।

हमदर्द था ‘गुलशन’ वही ग़म ख़्वार था घर में।
दीवार जो नफ़रत  की   गिराने   के  लिए  था।।

आईना ए गुलशन   99   गुलशन ख़ैराबादी

उल्फ़त में तू ऐ दोस्त बता क्या मिला मुझे।
घुट  घुट  के  तेरी याद में मरना पड़ा मुझे।।

मुंह पर जो मेरे कहता रहा ख़ुद बुरा मुझे।
वो आईना सिफ़त तो भला सा लगा मुझे।।

दिल को हुआ गुमान की आया है तू यहां।
कमरा जो तेरी याद से महका मिला मुझे।।

कैसा  जुनून ए इश्क़ था सहरा  में  गामज़न।
होश आया कब कहां कोई कांटा लगा मुझे।।

सैय्याद  इस  रिहाई  से क्या  फ़ायदा बता।
जब  पर  ही  मेरे काट के छोड़ा गया मुझे।।

साक़ी ने दी शराब पियूं भी तो किस तरह।
ये   जानता  हूं  देख   रहा  है  ख़ुदा  मुझे।।

‘गुलशन’ मैं तिशनगी का गिला किस तरह करूं।
जो भी मिला वो  प्यास  का सहारा मिला मुझे।।

आईना ए गुलशन    100    गुलशन ख़ैराबादी

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