दस्तार के बदले मेरा सर मांग रहे थे। Dastar ke Badli Mera sar mang rahe the


सब्जा़ है गुल है साया ए फ़ितरत है आजकल।
गुलशन  पे  मौसमों  की इनायत है आजकल।।

आ  रास्ता  हों  इल्म  के   ज़ेवर  से    बेटियां।
समझो  यही जहेज़  की  सूरत है आजकल।।

अपने    हुक़ूक़   के   लिए   बेदार   हो    गईं।
मजबूर  कब  यहां कोई औरत है आजकल।।

हर चीज  ही  गरां  है  तो  कैसे  हो फिर बसर।
सबको पता है कितनी मुसीबत है आजकल।।

दो  गज़  मिले  कहीं  भी  मिले  मोतबर  मिले।
हर शख़्स को ज़मीन की चाहत है आजकल।।

जिसने   मेरी   हयात  को  शादाब  कर  दिया।
उस रब को याद करने की हाजत है आजकल।।

चाहत  तुम्हारी   देख   कर   एहसास  ये   हुआ।
‘गुलशन’को भी अदब से मोहब्बत है आजकल।।

आईना ए गुलशन 116 गुलशन ख़ैराबादी

तुम्हारी  जब  इनायत  हो गई है।
हमारे दिल को राहत हो गई है।।

तेरे ही नाम से जिस सम्त देखो।
मोहब्बत ही मोहब्बत हो गई है।।

कोई  तो  बात है  तुझमें यक़ीनन।
मेरे दिल को जो चाहत हो गई है।।

मोहब्बत है किसी से शहर ए दिल में।
बताना  भी   मुसीबत   हो   गई   है।।

महेज़ जो ख़्वाब की सूरत थी कल तक।
वो  अब  कैसे   हक़ीक़त   हो  गई   है।।

छुड़ा  कर  जो  गया  था मुझसे दामन।
उसी  से  फिर   मोहब्बत  हो  गई  है।।

न जाने क्यों किसी की मुझपे ‘गुलशन’।
इनायत    ही   इनायत   हो   गई    है।।

आईना ए गुलशन  117  गुलशन ख़ैराबादी

मेरे  हाथ आई  मंज़िल  किसी और रह गुज़र से।
“मैं ख़ुद अपना आइना हूं मुझे काम है सफ़र से”

जो न फ़ैज़  पाया  मैंने  कभी दाग़  से  जिगर  से।
वही मुझको मिल गया है किसी आगही के दर से।।

रह ए आशिक़ी में कितना अभी आसरा है बाक़ी।
कोई  देखता है मुझको अभी प्यार की नज़र से।।

वो सुकूं हुआ है हासिल  मुझे फ़न से  शायरी के।
जो मिला नहीं था अब तक किसी दूसरे हुनर से।।

न भुला सकूंगा हरगिज़ कभी शफ़्क़त ए बुजुर्गां।
उसे  ज़िन्दगी मिली है  जो दुआओं के असर से।।

यही  नुकता ज़िन्दगी में  है  यक़ीन ओर गुमां का।
कोई  मांगता  है  रब  से  कोई  मांगता  बशर से।।

ज़रा  हट  के  पेंसिल से कभी नाम इक लिखा था।
हुआ आज क्या जो ‘गुलशन’ वो मिटा दिया रबर से।

आईना ए गुलशन   118   गुलशन ख़ैराबादी

मस्त था अपनी ही धुन में सब परिंदों का हुजूम।
“इक समन्दर के कनारे था दरख़तों  का हुजूम”

यूं उड़ाता जा रहा था ख़ाक  मस्तों  का हुजूम।
हर तरफ़ जैसे नज़र में हो फ़रिश्तों का हुजूम।।

वो  हमारी  क़ब्र  तक आता भला तो किस तरह।
उसको जब रोके हुए था घर के रिश्तों का हुजूम।।

एक  भी  पल  के  लिए  रोका नहीं मरने के बाद।
घर से बे घर के लिए आया था कितनों का हुजूम।।

वो  तमाशा  ज़िन्दगी  का  जो कभी देखा ना था।
देखने  के  वास्ते  आया  था  बच्चों  का  हुजूम।।

अपने  अपने    हम  सफ़र  को   ढूंढने  के  वास्ते।
कहकशां बन कर निकलता है सितारों का हुजूम।।

कोई  छोटा  या  बड़ा  क्या कैसा अदना  क्या  अमीर।
हर तरह इक सफ़ में था ‘गुलशन’ फ़रिश्तों का हुजूम।

आईना ए गुलशन 119  गुलशन ख़ैराबादी

वो  अपनी  दुआओं  में  असर मांग रहे थे।
जो  मांगने  वाले  थे  गुहर  मांग   रहे   थे।।

महफ़िल की चका चौंध से वो दूर थे लेकिन।
जो  रात  के  जागे  थे  सहर  मांग   रहे  थे।।

अल्लाह से  मांगा जो वही  हमको मिला है।
घर  जिनके  नहीं  थे  वही  घर मांग रहे थे।।

मुझको मेरे उस्ताद  से विरसे  में  मिला था।
कुछ  लोग  थे  जो  मेरा  हुनर मांग रहे थे।।

क्या लोग थे सब तेग़ बकफ़ ज़िद लिए अपनी।
दस्तार   के   बदले   मेरा   सर  मांग   रहे  थे।।

अल्लाह  के  बन्दे  थे  फ़रिश्तों  की  ज़ुबां में।
बे  घर  थे  सभी  आज  वो  घर  मांग रहे थे।।

हां  शेर  तो  पढ़ते  थे  मगर  देखिए ‘गुलशन’।
हर  शेर  पे  वो  दाद  ए  हुनर   मांग  रहे  थे।।

आईना ए गुलशन 120  गुलशन ख़ैराबादी

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