दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है Urdu shayari


“दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है “5ग़ज़लेंं

ज़िक्र  होता  है  मगर बात नहीं होती है।
आज कल उनसे मुलाकात नहीं होती है।।

वो  तवज्जो  वो  मदारात   नहीं  होती है।
मुफलिसों के लिए हक़ बात नहीं होती है।।

वो जगह आज भी आलम में यक़ीनन है जहां।
“दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है”।।

सोचता हूं कोई दुश्मन है मेरा खुद अपना।
जो  मेरे  बच्चों  की बारात  नहीं  होती है।।

बैठ जाते हैं जहां  साया घना मिल जाए।
हम परिंदों की कोई जात नहीं होती है।।

चाहता हूं कि उन्हें दिल में बिठा लूं लेकिन।
उनसे ये कहने की  औकात नहीं होती है।।

इक ग़लत चाल से बाजी ही पलट जाएगी।
यूं  ही  शतरंज में शह मात नहीं होती है।।

देखना सख़्त है चढ़ता हुआ सूरज ऐ दोस्त।
मेरी  आंखों  की   ये  औकात नहीं होती है।।

देख लेते हैं कभी तिरछी नज़र से वो भी।
ये अलग है कि  मुलाकात नहीं होती है।।

वो मुहब्बत तो बहुत टूट के करते हैैं मुझे।
क्या  करूं उन से कभी बात नहीं होती है।।

जिस तरह अश्क बरसते हैं मेरी आंखों से।
ऐसे  अन्दाज़  में  बरसात  नहीं  होती  है।।

होगी क़िस्मत में तो पीने को मिलेगी ऐ दोस्त!
चाय  उल्फ़त तो  है  सौगात  नहीं  होती  है।।

मिल ही जाती है किसी हाल में हो ऐ ‘गुलशन’
मुफ़लिसी  दोस्तो   खै़रात   नहीं   होती  है।।
गुलशन खै़राबादी

दिल पे क्या गुज़री मेरे दोस्त जहां तू न रूका।
आंख कमबख्त से उस बज़्में आंसू न रूका।।

जुस्तजू किसकी थी उसको ये खुदा ही जाने।
दश्तो  सहरा में भटकता  रहा  आहू न रूका।।

उसको  होना  ही था  दीवाना  तुम्हारा  जाना।
चल गया जिसपे तेरी चश्म का जादू न रूका।।

करवटें मैंने भी बदली हैं शबे हिज्र  में  दोस्त।
दिले मुज़्तर जो मेरा एक भी पहलू न रूका।।

चाँद हर रोज गुज़रता रहा आँगन से मेरे।
एक पल के लिए घर दोस्तों मामू न रुका।।

मैं  ये समझा था अंधेरे को उजाला देगा।
उड़ गया देखते ही देखते जुगनू न रुका।।

रोक  लेता  मैं भला  कैसे  तुझे    ऐ ‘गुलशन’
एक पल के लिए जब आँख में आँसू न रुका।।
गुलशन  ख़ैराबादी

बज़्मे गुलशन की तरफ से सब यहाँ आज़ाद है।
जिस तरह शेरो  सुख़न में  अपना  खै़राबाद है।।

देने  वाला  ख़ुश अगर  है  लेने  वाला  शाद है।
सब से  बेहतर  काम यारों  दीन में  इमदाद है।।

इल्मो फ़न की महफ़िलों में ऐश देखा है मियाँ।
आप चाहे भूल जायें हमको सब कुछ याद है।।

ज़िन्दगी से रूठ कर हासिल हुआ क्या दोस्तो।
मैं  इधर  बरबाद हूँ   वो  भी  उधर  बरबाद है।।

ग़रक  करदे  बातिलों  की  ये  हुकूमत  ऐ  खुदा।
बस यही दिल की सदा  है बस यही फ़रियाद है।।

नोट बन्दी  गोस्त बन्दी  अब है  पोलीथीन बन्द।
इतनी सारी  बन्दियों  के  बाद क्या आबाद है।।

तंग हम सब आ चुके हैं लफ्ज़ बन्दी से जनाब।
आज  कल हर आदमी इस देश का बरबाद है।।

फ़ज़ले  हक़ का  दोस्तो एहसान है इस देश पर।
जिनकी निसबत से हमारा मुल्क अब आज़ाद है।

है बुजुर्गों की इनायत और अल्लाह का करम।
दोस्तों   जो    आज   ख़ैराबाद   ख़ैराबाद   है।।

यूँ  तो  पढ़ने  को पढ़े हैं  शेर  सब ने बे मिसाल।
शेर”गुलशन”वो ही थे जिनमें मिली कुुछ दाद है।।
गुलशन खै़राबादी

जो हवेली हमसे  बनवा कर भी गिरवाई  गई।
दोस्तों इसमे भी  उनकी  ही  अना  पाई  गई।।

फिर हमारे दिल की धड़कन दोस्तों बढ़ने लगी।
चौक  वाली जब हवेली हमको दिखलाई गई।।

जो ग़ज़ल हमने कही थी लखनऊ की शान में।
वो  ग़ज़ल  हमसे   हज़ारों  बार  पढ़वाई  गई।।

मैं  नहीं  कहता  ये  कहता  है  ज़माना दोस्तो।
“दस्ताने  शौक़  कितनी   बार   दोहराई  गई”।।

आज तक जो ना मुकम्मल  है हवेली दोस्तो।
उस हवेली में किसी की लाश दफ़नाई  गई।।

हम  जहाँ भी घूम आए हैं मगर कर लो यक़ी।
मग़रिबी तहजीब हम से  ये न  अपनाई गई।।

जब अयोध्या बाबरी मस्जिद शहादत पा गये।
तब वही तस्वीर दुनिया भर में दिखलाई गई।।

मैं  हुसेना बाद  का “गुलशन” नहीं  हूँ दोस्तों।
ये ख़बर झूठी है  टीवी पर जो दिखलाई गई।।
गुलशन ख़ैराबादी

शफ़्क़त है मुहब्बत है आईना ए गुलशन में।
अल्लाह की रहमत है आईना ए गुलशन में।।

मज़मून निराले हैं पढ़ कर तो ज़रा देखो।
जिद्दत है रवायत है आईना ए गुलशन में।।

हक़ बात को हक़ कहना यारो मेरी फ़ितरत है।
हर  बात   हक़ीक़त है  आईना ए गुलशन में।।

अशआर जो लिखे हैं सब रब की इनायत है।
अपनी थी कहां जुर्अत आईना ए गुलशन में।।

जो कुछ भी कहा हमने तारीफ़ है सब रब की।
सब  उसकी  इनायत है आईना ए गुलशन में।।
          
मजमूआ हमारा है हर दिल को जो प्यारा है।
ये भी तो  हक़ीक़त है आईना ए गुलशन में।।

ये हम ही नहीं कहते  कुछ लोग भी कहते हैं।
सब रब की बदौलत है आईना ए गुलशन में।।

अश्आर  हमारे जो महफ़िल में पढ़े कोई।
कुछ और करामत है आईना ए गुलशन में।।

ये  रब ने अता की है गो याई जो ऐ ‘गुलशन’।
हस्सान की निस्बत है आईना ए गुलशन में।।
#गुलशन #खै़राबादी

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