घर महकता है अभी तक मेरा। Ghar mehekta hai hai abhi tak mera


देख के मौसम भीगा भीगा याद ने ली अंगड़ाई है।
दिल  में  दर्द  उठा  है  कैसा  कैसी  ये पुरवाई है।।

रात को रात कहा जाता है दिन को दिन ये मान लिया।
बात ये सच है आज जो तूमने महफ़िल में फ़रमाई है।।

राहे वफ़ा में साथ कभी थे बिछड़ गये चलते-चलते।
देखके अब तस्वीर उसी की आंख मेरी भर आई है।।

ख़ून तोआख़िर ख़ून है अपना ये न जुदा होगा हरगिज़।
बन जाओ तुम इसकी सहारा ये तो अपना भाई है।।

अक़ल से अपनी बैठ के सोचो फ़िर हक़ को तस्लीम करो।
दिल की बातें कम ही मानो ये दिल तो हरजाई है।।

किसकी चाहत में खिलते हैं फूल सभी अरमानों के।
गुलशन गुलशन ज़िक्र है किसका किसने फ़जा़ महकाई है

रोने से हासिल क्या होगा सोच समझ लो ऐ ‘गुलशन’।
प्यार में ऐसा करना भी तो अपनी ही रुसवाई है।।

आईना ए गुलशन..81..गुलशन ख़ैराबादी

मैं  लफ़्ज़ों  में  जादूगरी चाहता हूं।
इनायत फ़क़त आपकी चाहता हूं।।

कोई मुझको मुजरिम न कहे कर पुकारे।
अदालत   से   होना   बरी  चाहता हूं ।।

मुखा़लिफ़ को मैंने गले से लगाया।
मैं दुश्मन से भी दोस्ती चाहता हूं।।

खुशी से कटे मेरी अहले जहां में।
मैं ऐसी ही बस ज़िन्दगी चाहता हूं।।

ज़माने में गिर जाऊं सबकी नज़र से।
मैं   ऐसी   कहां   बे ख़ुदी चाहता हूं।।

जो नक़्शे क़दम पर चलें आप ही की।
सभी   के  लिए  आगही चाहता हूं ।।

लिखूं जिसमें नग़में तुम्हारी वफ़ा के।
मैं  ‘गुलशन’ वही  डायरी चाहता हूं।।

आईना ए गुलशन…82…गुलशन ख़ैराबादी

यूं  चमन  से  गुज़र  के देखा है।
पत्ता  पत्ता  ठहर  के  देखा है।।

जी  के  देखा  है  मर  के  देखा  है।
हमने सब कुछ तो कर के देखा है।।

चश्मे   नाज़ुक  की राह से मैंने।
उनके  दिल में उतर के देखा है।।

फूल होना कोई कमाल नहीं।
ख़ार सूरत निखर के देखा है।।

मां की मेरे दुआ ही काम आई।
हर अमल मैंने कर के देखा है।।

आईना  तेरी  याद का रख कर।
मैंने  ख़ुद  भी  संवर के देखा है।।

दौलत ए ग़म न यूं मिली ‘गुलशन’।
कू ए  जां  से  गुज़र  के  देखा है।।

आईना ए गुलशन..83..गुलशन ख़ैराबादी

क्या कहा तुमने कि मैं सर को झुका सकता नहीं।
अब तो मैं हरगिज़ तुम्हारे साथ आ सकता नहीं।।

हां तुम्हें हक़ है मुकर जाओ क़सम खाने के बाद।
झूठी क़समें मैं किसी क़ीमत पे खा सकता नहीं।।

तेरी महफ़िल का तो ये आलम है सब बेज़ार हैं।
गीत  होठों पर हैं लेकिन गुनगुना सकता नहीं।।

तुम कहां भटका करोगे मंज़िलों की आस में।
रास्ता जिस शहर में कोई बता सकता नहीं।।

तू की है बस इस तरह जैसे हो सहरा में सराब।
“आईना पानी तो रखता है पिला सकता नहीं”

तेरे  जलवे  ओर   पसे  पर्दा  ये   कैसा  इम्तिहां।
क्या नक़ाब ए रुख़ भी चेहरे से हटा सकता नहीं।।

बा रहा  सोचा  है  ‘गुलशन’  रात  की  तन्हाई में।
आपको मैं अपने दिल से क्या भुला सकता नहीं।।

आईना ए गुलशन..84…गुलशन ख़ैराबादी

दर्द  उसका  है  अभी तक मेरा।
जिससे रिश्ता है अभी तक मेरा।।

जाने किसकी है तलब  रात गए।
दिल भटकता है अभी तक मेरा।।

इक तेरे लम्से तसव्वर के सबब।
घर  महकता  है  अभी तक मेरा।।

जिस  बुलन्दी  पे  नज़र है तेरी।
“वो  इलाका़  है  अभी तक मेरा”

शहरे अनवार को देखू यार रब।
दिल  तड़पता है अभी तक मेरा।।

हक़   नुमाई   का   बनू   आईना।।
दिल ये कहता है अभी तक मेरा।।

किसकी है चश्मे करम ऐ ‘गुलशन’
फ़न  महकता  है  अभी तक मेरा।।

आईना ए गुलशन..85..गुलशन ख़ैराबादी

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