गुलशन मैं अपना हाथ बढ़ा दूं नहीं नहीं। Gulshan main apna hath badha dun nahin nahin


सहारे दोनों को हासिल हैं ज़िन्दगी के लिए।
वो है किसी के लिए और मैं किसी के लिए।।

मुझे  तू  फूल  दे  या  ख़ार  दे  तेरी मर्ज़ी।
मैं आ गया हूं तेरे दर पे हाज़िरी के लिए।।

दिखा रहे थे जो औरों को बरहमी की अदा।
तड़प  रहे  हैं  वही  लोग  दोस्ती  के लिए।।

करेगा चाक अभी ज़ुल्मतों के सीने को।
कोई चराग़ जलाओ तो रौशनी के लिए।।

मैंने नज़्म लिखूं कसीदा लिखूं ग़ज़ल लिखूं ।
अदब में कम नहीं  अस्नाफ़ शायरी के लिए।।

कहा था तूने की सबसे किनारा कर लूं तो देख।
मैं  छोड़  आया  हूं  दुनिया  तेरी ख़ुशी के लिए।।

किसी से क्या मिलूं राहे तलब में ए ‘गुलशन’।
मेरा  जुनूं   है  बहुत  मेरी  रहबरी  के  लिए।।

आईना ए गुलशन 106   गुलशन ख़ैराबादी

चराग़ ए ज़ीस्त के अब  हर तरफ़ उजाले हैं।
तुम्हारे  दर्द  को  हम अपने दिल में पाले हैं।।

लिखे थे ख़त जो कभी तुमने मेरी चाहत में।
बड़े ख़ुलूस ओ मोहब्बत से सब संभाले  हैं।।

यक़ीन हो न हो तुझको मगर ख़ुदा की क़सम।
ये  जान ओ  दिल  मेरे  बेशक  तेरे  हवाले हैं।।

अता जो उसने किए हमको ज़िन्दगी के लिए।
हमारे  हक़   में  वही  ख़ूब  तर  निवाले  हैं।।

ये  ज़िन्दगी  भी  तेरे  नाम  की  अमानत है।
तेरे ही दर्द  को  इस ज़िन्दगी में मैंने पाले हैं।।

तुम्हारे  अश्क  जो  बहते  हैं  मेरी  आंखों  से।
ये बार ए सोज़ ए मोहब्बत भी हम संभाले हैं।।

तुम्हारे  चाहने  वालों  की  भीड़  है ‘गुलशन’।
कोई  तो   देखे   मेरे   पांव  में  जो  छाले हैं।।

आईना ए गुलशन  107 गुलशन ख़ैराबादी

किसी  से  रोज़  कोई  बस यूं ही मिला न करें।
मिले जो दिल से वो बिछड़े कभी ख़ुदा न करें।।

ये  सानेहा भी अजब  है किसी की उल्फ़त में।
वो  अपने  हाथ  उठा ले  मगर  दुआ  न  करें।।

अमीर ए  शहर  है  हातिम नहीं  है वो लोगो!
अजब है क्या जो ग़रीबों का वो भला न करें।।

ज़मीं  पे  बिखरे  हैं  शाख़ो  से  टूट कर  पत्ते।
कोई  हवा  हमें  अपनों  से यूं  जुदा  न  करें।।

अजीब फ़ितरत ए  महबूब भी है दुनिया में।
कभी वफ़ा भी करें ओर कभी वफ़ा न करें।।

शब ए बरात में होता है रहमतों  का  नुज़ूल।
तो ऐसी रात का हक़ क्यों कोई अदा न करें।।

क़दम क़दम पे उसी का है  ज़िक्र ऐ ‘गुलशन’।
हयात क्या  है  किसी  मोड़  पर वफ़ा न करें।।

आईना ए गुलशन 108  गुलशन ख़ैराबादी

हाल ए दिल जब मेरा क़ासिद ने सुनाया होगा।
उसने  शीशा  किसी  पत्थर  पे  गिराया होगा।।

मेरा  चेहरा जो  तख़य्यूल  में  भी आया होगा।
अपनी  नज़रों  को उसी वक़्त झुकाया होगा।।

जब  मेरी  याद  ने  रह  रह  के सताया होगा।
उसने मुश्क़िल से बहुत मुझको भुलाया होगा।।

हर घड़ी रहता हूं  सीने में जो धड़कन बन कर।
इस  तरह  कौन  तेरे  दिल  में  समाया  होगा।।

क्या ख़बर थी दम ए आख़िर ये क़यामत होगी।
हर तरफ़ सिर्फ़ ग़म ओं  यास का साया होगा।।

जब सुनी होगी ख़बर  मेरे  दम ए आख़िर की।
मेरी  यादों  ने  बहुत  उसको   रुलाया  होगा।।

बस यही सोच के ‘गुलशन’ मैं सहम जाता हूं।
इक न इक  दिन  मेरा  महबूब  पराया होगा।।

आईना ए गुलशन 109  गुलशन ख़ैराबादी

तुझको मैं अपने दिल से भुला दूं नहीं नहीं।
रस्म ए  वफ़ा  के  दीप  बुझा  दूं नहीं नहीं।।

तू  खो गया है  लाख  ज़माने  की भीड़ में।
फिर  भी  तेरा  ख़्याल मिटा  दूं नहीं नहीं।।

ये क्या सितम की  तुमको भुलाने के वास्ते।
जितने   ख़ुतूत  हैं   वो  जला  दूं नहीं नहीं।।

इक नक़्श था जो दिल में तेरी याद बन गई।
तारीख़  का  ये  बाब   हटा   दूं  नहीं  नहीं।।

अपना जो  हो  रफ़ीक़  तो कुछ बात और है।
दुश्मन  को  दिल  की बात बता दूं नहीं नहीं।।

रौशन हैं मेरे  दम  से  नुक़ूश ए वफ़ा अभी।
राहों  से  ख़ुद  को  तेरी  हटा दूं नहीं नहीं।।

माना कि वो सख़ी  है  मगर उसके सामने।
‘गुलशन’ मैं अपना हाथ बढ़ा दूं नहीं नहीं।।

आईना ए गुलशन 110  गुलशन ख़ैराबादी

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *