ज़िन्दगी फिर भी सबको प्यारी है। Jindagi fir bhi sabko pyari hai

आईना ए गुलशन 15=18  गुलशन ख़ैराबादी
डॉ अज़ीज़ खै़राबादी ..
        “आईना ए गुलशन पर एक तायराना नज़र”
खै़राबाद अवध  एक मर्दन खे़ज़ ख़ित्ता रहा है । हर दौर में यहां बेमिसाल हस्तियां नमूदार होती रही हैं जो न सिर्फ़ मुलकी  सतह पर बल्कि तमाम आलम में अपने नाम रोशन कर चुकी हैं। ये क़स्बा इल्म ओ अदब  सियासत व शक़ाफ़त  इस्लामियात और रूहानियत के एतबार से भी अपना आला मक़ाम रखता है।कि इस क़दीम मिस्र,ग़रनाता,  स्पेन और यूनान का हमसर करार दे सकते हैं।
एक ज़माना था कि तिशनगाने इल्म व मारिफ़त दूरदराज़ से आ कर इसी मदीनतुल इल्म से अपनी प्यास बुझाया करते थे । कभी यहां बड़े-बड़े इल्मी मरकज़ और दर्सगाहें थीं। मौलाना फ़ज़ल ए हक़ इमाम के घर आने से हिंदवी बैरून  हिंद के तोलबा इकतिसाब ए इल्म करते रहे। अल्लामा फ़ज़ल ए हक़ खै़राबादी जहां एक तरफ़ बा कमाल आलिम थे वहीं दूसरी तरफ़ अर्बी ज़ुबान के मुनफ़रिद शायर भी थे। जिन्होंने ग़ालिबन 10,000 अरबी ज़ुबान में शेर कह कर अरब दुनिया और अरबी जानने वालों में सिक्का बैठा दिया।
इनकी जिलावतनी  बेमिसाल थी । आप ही 1857 ईस्वी में अंग्रेजों के खिलाफ़ जिहाद का नारा बुलंद किया था जिसकी पादाश में उन्हें का काला पानी की सज़ा हुई और वही अंडमान निकोबार में अपनी जान जानेआफ़रीं  के सुपुर्द कर दी। लाला हरिप्रसाद बख़शी भी इसी ख़ैराबाद से ताल्लुक़ रखते थे जो बेग़म हज़रत महल की फ़ौज में आला अफ़सर थे और अंग्रेजो के खिलाफ़आख़िरी दौर की जंग में शहीद हुए।
शायरी के मैदान में भी हर दौर में आसमान ए सुख़न के रौशन सितारे एक आलम को जगमगाते रहे हैं।
ये कहना ग़लत न होगा कि “जराएम होते ये मिट्टी बड़ी जरखे़ज़ होती है”।
गुलशन खै़राबादी हज़रत यक़ीन अहमद तिर्मीजी  (आक़ा ए सुख़न हज़रत वसीम खै़राबादी के पोते और हज़रत असीम खै़राबादी के साहबजा़दे) के शागिर्द रहे हैं । यक़ीन साहब खै़राबादी के पूरे घर का माहौल ही शायराना था । लिहाज़ा उन्हें शायरी विरसे में मिली थी। वक़्तन फ़वक़्तन अपने वालिद साहब हज़रत हसन असीम साहब खै़राबादी से भी मशवरा ए सुख़न कर लिया करते थे । इस तरह वो घर की फ़जा़ की बदौलत फ़ितरतन शायर वाक़ए हुए । हजरत असीम साहब खै़राबादी के एक शागिर्द  जुंबिश खै़राबादी ने बड़ा नाम कमाया।
गुलशन खै़राबादी हज़रत यक़ीन खै़राबादी से वाबस्ता हुए मगर ये साथ कुछ ही वर्षों तक रहा क्योंकि यक़ीन साहब 1993 में तक़रीबन 55 साल की उम्र में दुनिया ए फ़ानी से कूच कर गए। उन्हें दिनों तक रिबन 1992 में जब मैं खै़राबाद  वापस हुआ तो यहां के हल्का ए अदब में बड़ी बेचारगी का आलम देखा।
उन्हीं दिनों गुलशन खै़राबादी का रुझान शायरी की तरफ फिर माइल हुआ वह मेरे साथ हो लिए। कुछ अर्से तक मैंने उनके कलाम को बड़े मोहब्बत और शफ़्क़त के साथ सुना पढ़ाऔर इस्लाही नज़र भी डाली । गुलशन खै़राबादी कुछ रवायती शायरी के ज़्यादा क़रीब रहे और इसी लिए उनके कलाम में आज की जदीद शायरी का लबो लहजा उभर कर सामने न आ सका  फिर भी ये कहना ग़लत न होगा कि मुद्दत के बाद करवट बदली तो ये हुआ की रवायत की पासदारी करते हुए  जदीद क़दरों को भी पेश नज़र रख रहे हैं । दूसरे कलाम  में  फ़हश मफ़ाहिम और सियासत से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं। जोश अख़लाक़ मिलन सार और  सादा मिज़ाजी से वो जल्द ही लोगों को मुतासिर कर लेते हैं । इनके कलाम में मोहब्बत का पैग़ाम है जिस का परचम बुलंद किये हुए हैं। खास बात ये है कि गुलशन खै़राबादी  उर्दू से बेहद मोहब्बत करते हैं । या बा अल्फा़ज़ ए दीगर वो उर्दू के दीवाने हैं।
किस नज़र से देखा जाए तो वो उर्दू के ख़ादिम की हैसियत से नज़र आते हैं। बज़्में गुलशन इनकी अपनी बज़्म है । जिसके जेर ए अहतमाम हर माह की 15 तारीख़ को नशिस्त का इनअक़ाद होता है जिसकी सबको ख़बर है। इनके चन्द  शेर काराईन की नजर कर रहा हूं ।
मुलाहिजा़ फ़रमाएं।

ख़ून ए मज़लूम जो होता है ज़मीं पर कोई।
मुझ से हस्सास की आंखों से रवां होता है।।

आदमी गर्दिश ए हालात से घबराए क्यों ।
चांद तारों में भी गर्दिश का समा होता है।।

मैं कि मुजरिम हूं तेरा और वफा़दार भी हूं।
दे सज़ा मुझको कभी और कभी रहने दे।।

तड़पता  था  मैं तुमसे दूर रह कर ।
क़रीब आ कर बहुत पछता रहा हूं।।

करेला  जानते  हैं  सब कि  है  तासीर में कड़वा।
अगर ये नींम चढ़ जाए तो फिर यारी नहीं करते।।

नसीब  होता  नहीं  एक घर भी है ‘गुलशन’।
हसीन ख़्वाब तो हम भी महल के देखते हैं।।

अब बहर हाल गुलशन खै़राबादी का पहला शेरी मजमुआ “आईना ए गुलशन” मंज़र ए आम पर आने को है । इसलिए मुबारक बाद के साथ-साथ अपनी दिली दुआएं दे रहा हूं कि अल्लाह ताला इन्हें मजीद जोर ए क़लम अता करे ताकि आइन्दा इससे बेहतर कलाम दुनिया ए अदब के सामने आता रहे ‘आमीन’ इन्हीं अल्फ़ाज़ के साथ
18/8/2018ईस्वी
डॉ अज़ीज़ खै़राबादी
गुलबर्ग मंज़िल काला प्यादा
खै़राबाद अवध सीतापुर यूपी
मोबाइल नंबर 94509 01544

आईना ए गुलशन  19=21 गुलशन ख़ैराबादी
अनवार सीतापुरी ..
                 उर्दू उमंग का शायर
कस्बा खै़राबाद अवध जिला सीतापुर यू पी किसी तअरुफ़ का मोहताज नहीं है।
इस सर ज़मीन पर ओलमां , फ़कीर,अदबा, शोरा, ने करवटें बदली हैं जहां पर हज़रत रियाज़ खै़राबादी वसीम खै़राबादी, कौसर खै़राबादी, मुज़तर खै़राबादी जिनके बेटे जां निसार अख़्तर खै़राबादी हुए।
दौरे हाज़िर में बहुत अच्छे फ़नकार इस क़स्बे की रहनुमाई कर रहे हैं खुशी के साथ तहरीर करना पड़ रहा है कि काफ़ी नौजवान शायर व शायरी की राह पर गामजन है जिनकी देखभाल क़स्बा के उस्ताद शायर कर रहे हैं जैसे अज़ीज़ खै़राबादी, गौहर खै़राबादी, ज़िया अंसारी , ज़िया खै़राबादी नफ़ीस खै़राबादी मजाज़ सुल्तानपुरी, बहुत अच्छा माहौल है ख़ूब शेरी  नशिस्त होती रहती हैं।
मुझे  ख़ुशी इस बात की है कि इस सर ज़मीन पर वो शोरा जिन्होंने उर्दू पढ़ी भी है  उर्दू और हिंदी दोनों जवानों में शेर कहते हैं  और सभी मिलकर एक साथ रहते हैं। ख़ुदा नई उम्र के शायरों को तरक्की़ दे।
अब मैं जनाब गुलशन खै़राबादी  के बारे में कुछ तहरीर करने की फ़िक्र कर रहा हूं जनाब गुलशन खै़राबादी का पूरा नाम अशफ़ाक अली तख़ल्लुस  गुलशन खै़राबादी है।
आप 9 अक्टूबर 1964 ईस्वी को हज़रत शाकिर अली मोहल्ला शेख़ सराय  खै़राबाद के घर में पैदा हुए।
आप सात भाई दो बहनें हैं
गुलशन साहब का शायराना सफ़र जुलाई 19 84 से शुरू हुआ।
आपको यक़ीन खै़राबादी से शर्फ़ तलम्मुज़ हासिल है। उर्दू से दिली लगाओ है गुलशन साहब की शायराना फ़ितरत और सूझबूझ ये सब ख़ुदा की देन है।
आपके हाथ में क़लम और काग़ज़ हर वक़्त रहता है।
आपकी शायरी में जदीद लबो लहजा भी है।
मगर रवायत का दामन आपने कभी नहीं छोड़ा ।
गुलशन साहब सिर्फ ग़ज़ल या नज़्म के कायल नहीं हैं आप क़ताअत,  गीत, नात शरीफ़  व मनक़बत  हर सिनफ़े  सुखन पर तबा आज़माई  करते हैं ।
सच तो ये है कि आप हर वक़्त शेरों अदब की दुनिया में  गर्क़  दिखाई देते हैं। आपने उर्दू को ज़िन्दा रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश की है। आपके कलाम में फ़िक्र के पहलू जगह-जगह नज़र आते हैं ।
आपने ज़माने का दौर और दौरे हाज़िर के जुल्मों सितम को बड़ी ही ख़ूबी से नज़्म किया है ।आपने नज़्म, नात पाक पर भी बहुत मेहनत की है। गीत भी ख़ूब कहते हैं ।आपकी बज़्म है ‘बज़्में गुलशन’ जिसकी तरही नशिस्त हर माह की 15 तारीख को पाबंदी के साथ होती है क़स्बे के लगभग सभी शायर शिरक़त फ़रमाते हैं जिसमें हाजी निसार अहमद खै़राबादी बहुत मोहब्बत के साथ तशरीफ लाते हैं ख़ुदा का शुक्र है और ख़ुदा करे गुलशन साहब साहिबे दीवान हों और अल्लाह आपको मक़बूल करें। ‘आमीन’
गुलशन साहब के चंद शेर  हाज़िर हैं ।

फ़सल ए गुल की तरह तेरी दुनिया।
ये  दुआ  है  कि  उम्र  भर  महके।।

शहर जाकर मुझे ख़्याल आया।
किस क़दर कीमती ये पानी है।।

चांद  तारों  पे  है सफ़र  अपना।
यानी होगा वहां भी घर अपना।।

तू खो गया है  लाख ज़माने की भीड़ में।
फिर भी तेरा ख़्याल मिटा दूं नहीं नहीं।।

दयार ए ग़ैर में ये सानिहा भी ख़ूब रहा।
“हमें जो दे गए मिट्टी वो सब पराए थे “

रहे आशिक़ी में कितना अभी आसरा है बाक़ी।
कोई देखता है मुझको अभी प्यार की नज़र से।।

एक  मुद्दत  से उसके होठों पर।
तपते सहरा की प्यास हो जैसे।।

उजाला ही उजाला हर तरफ़ फैला है आलम में।
नज़र आता है ज़र्रे ज़र्रे में जलवा मोहम्मद का।।

कुरआन पढ़ रहे हैं समझते कहां हैं लोग ।
जिसने समझ  लिया  है  वही कामरान है।।

बहुत सीधे-साधे लफ़्ज़ों में शेर कहना गुलशन साहब की फ़नकारी है।
इन्हीं लफ़्ज़ों के साथ
सैयद अनवारूल हक़ नक़वी
अनवार सीतापुरी

आईना ए गुलशन 22=23  गुलशन ख़ैराबादी
सादिक़ अली अंसारी ..
            कुछ गुलशन खै़राबादी के बारे में

खै़राबाद अवध हिंदुस्तान में इस्लाम उलूम व मारिफ़त का एक मुम्ताज़ मरकज़ रहा है।
यहां मख़दूम शैख़ साद खै़राबादी  व मख़दूम शैख़ निजामुद्दीन खै़राबादी की खानका़हें मौजूद हैं जिनकी वजह से तमाम मजा़हिब ओ  मिल्लत के मानने वाले हैं। और एक तरह से कौ़मी यकजहती का सर चश्मा जारी है।
इस मर्दन ख़ेज़ ख़ित्ते को एक और इम्तियाज़ अल्लामा फ़ज़ल ए हक़ खै़राबादी के सिलसिले से भी हासिल है आज़ादी की तहरीक से मुन्सलिक जिन सत्तरह सूरमाओं  को बरतानवी हुकूमत ने काला पानी की सजा़ सुनाई उनमें मौलाना फ़ज़ल ए हक़ खै़राबादी का नाम ए नामी सर ए फ़ेहरिसत दर्ज है।
दुनिया ए शेरो अदब में शोहरत रखने वाले बेताज बादशाह जनाब रियाज़ खै़राबादी, वसीम खै़राबादी, असीम खै़राबादी मुज़तर खै़राबादी , जां‌निसार अख़्तर खै़राबादी और जावेद अख़्तर वगैरा यही के चश्मों चिराग़ हैं।
इसी अदबी लश्कर के मुजाहिद का एक नाम अशफ़ाक अली गुलशन खै़राबादी है । जो 9 अक्टूबर 19 64 ईस्वी में जनाब शाकिर अली के यहां पैदा हुए क्योंकि फ़नकार हस्सास होता है इससे सोचने समझने का ढंग औरों से जुदा होता है अपने अतराफ़ समाजी और सियासी कोताहियों  और ना हमवारियों के इज़हार के लिए गुलशन साहब ने शायरी को चुना और यक़ीन खै़राबादी  की सरपरस्ती में  शेरी सफ़र शुरू किया। उस्ताद यक़ीन अहमद के इंतकाल के बाद आपने दयार के मशहूर मारूफ़ शायर जनाब डॉ अज़ीज़  खै़राबादी  से स्लाह ले रहे हैं। अशफ़ाक अली गुलशन का नातिया कलाम मेरे नज़र से गुज़रा है।
वो मुफ़रिद रिसायल में अपना कलाम बग़रज़ इशाअत इरसाल  करते रहते हैं इस तरह अदबी इशाअत  में उनका ख़ास हिस्सा और ताऊन  है। इनका तग़ज्जुल  दिल को छू लेता है । वो कई अदबी तंजीमों से जुड़े हुए हैं । ये भी उर्दू जुबान व अदब की  ख़िदमत है। तरही नशिस्तों  में वो बराबर
शरीक रहते हैं। मेरी नज़र में आज मुशायरा से उर्दू में हद दर्ज़ा की गिरावट आई है । जबकि अदबी  शेरी नशिस्तें और तरही शेरी नशिस्तें किसी  हद तक जुबान को संभाले हुए हैं ।
आज गुलशन साहब के पास इतना अदबी सरमाया मौजूद है कि वो शेरी मजमुआ साया कराने जा रहे हैं मैंने उनका मसौदा देखा है जिसमें शामिल बेस्तर कलाम रिसाइल में साया हो चुका है इसका उन्हें एतराज भी है। ज़िन्दगी को उन्होंने बहुत करीब से देखा है ।
बेवफ़ा होने के बावजूद इंसान ज़िन्दगी पर यक़ीनी हद तक भरोसा करने को मजबूर है।

जानते  हैं   कि   बेवफा़  है  मगर।
ज़िन्दगी फिर भी सबको प्यारी है।।

शायर सियासी न हमवारियों से भी मुकम्मल तौर पर आशना और बेदार नज़र आता है।

मंज़र वो कश्मीर के या गुजरात के हों।
सीने  में  दिन  रात  सुलगते  रहते हैं।।

अशफ़ाक अली गुलशन खै़राबादी के यहां क़दामत पसंदी और साथ ही जदीदियत की पास दारी देखने को मिलती है। मुझे बेहद मसर्रत है कि उनका शेरी मजमूआ साया होने जा रहा है । ख़ुदा करे कि जल्द ही ये शेरी किताब साया होकर अदबी हलक़े में पजीराई की मंज़िल तक पहुंचे।
अपनी नेक ख़्वाहिशात के साथ।
सादिक़ अली अंसारी
साबिक़ मनसरिम रीडर सोल कोर्ट्स सीतापुर

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *