लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं। Lo ab tumhari raah mein Deewar ham nahin

Sad Shayari by Gulshan Khairabadi

“लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं”

करते हैं उनसे प्यार का इन्कार हम नहीं।
दिल कर रहा है दर्द का इज़हार हम नहीं।।

दिरहम नहीं हैं पास  ख़रीदार  हम नहीं।
यूसुफ़ के होंगे और तलब गार हम नहीं।।

हमने  वतन  के  वास्ते  अपना  लहू  दिया।
उनकी नज़र में फिर भी वफा़दार हम नहीं।।

सच बोलने पे आज भी सूली मिली तो क्या।
अल्लाह   जानता  है  ख़ता  वार  हम  नहीं।।

कै़दी  बना  लिया  है रक़ीबों  ने शहर में।
“लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं”

बातिल  परस्त  दिल  न  सुने  और बात है।
अपनी नज़र में अब भी गुनहगार हम नहीं।।

क़ायम  रहा  है  हमसे  भरम बर्गोबार का।
‘गुलशन’ में बनके फूल रहे ख़ार हम नहीं।।

आईना ए गुलशन – 86 – गुलशन ख़ैराबादी

किसी को पानी के दो घूंट भी नसीब नहीं

अजीब यास का मंज़र दिखाई देता है।
जिधर भी देखिए पत्थर दिखाई देता है।।

हवाए जुल्म का वो ज़ोर है जहां में कि अब।
हर एक शख़्स सितमगर  दिखाई देता है।।

शुमार ज़ख्मों का किस्त तौर पर करे कोई ।
तमाम  जिस्म ही नश्तर  दिखाई  देता  है।।

किसी को पानी के दो घूंट भी नसीब नहीं।
किसी  के  हाथ में  साग़र  दिखाई देता है।।

इसी  के  साया ए  दीवार  में  पले  थे  हम।
खन्डर की शक़्ल में जो घर दिखाई देता है।।

ख़ुदा ही जाने कि अब कारवां कहां पहुंचे।
अजीब   हाल   में   रहबर  दिखाई देता है।।

दुआएं बाबे असर तक पहुंच गई ‘गुलशन’।
बुलंद तेरा मुक़द्दर   दिखाई   देता   है।।

आईना ए गुलशन – 87- गुलशन ख़ैराबादी

छेड़ कर ज़िन्दगी के नाम ग़ज़ल

जब से अपना बना गया कोई ।
मुझको जीना सिखा गया कोई ।।

फिर  ख़्यालों में आ गया कोई ।
गुंचा ए  दिल खिला गया कोई ।।

ज़ीनत ए ख़ाना ए वफ़ा होगा ।
आज  मेहमान  आ गया कोई ।।

देकर पैग़ाम इक सदाक़त का ।
सारे  आलम पे  छा गया कोई।।

हर तरफ बू ए उर्दू  फैल  गई ।
राह ऐसी दिखा गया कोई।।

छेड़ कर ज़िन्दगी के नाम ग़ज़ल।
सारी महफ़िल पे छा गया कोई।।

शेर ‘फ़ानी’ के थे सभी ‘गुलशन’।
नाम  अपना  लिखा गया कोई।।

आईना ए गुलशन – 88 -गुलशन ख़ैराबादी

लेकिन वो तो मेरी ख़ातिर ख़ाली रस्ता छोड़ गया

किस्सा प्यार का कहते-कहते कैसी अधूरा छोड़ गया।

खुद तो नींद की गोद में सोकर मुझको रोता छोड़ गया

किसको सुनाएं दिल की बातें कौन सुनेगा ग़म अपना।

एक वही  था  सुन  ने वाला  वो भी तन्हा छोड़ गया ।।

लौट के आने वाला होता तो मैं कहता लौट आना।

लेकिन वो तो मेरी ख़ातिर ख़ाली रस्ता छोड़ गया।।

उसकी नवाज़िश उसका करम सब जिसने बढ़ाया अज़्म मेरा।
सूरते शम्मा इश्क़ बनाकर मुझको जलता छोड़ गया।।

अब किस पर विश्वास करें हम शहरे तमन्ना में आख़िर
जिसको हम दरिया समझे थे वो भी प्यासा छोड़ गया।

उसके रहने से रौनक़ थी मेरे घर ओर आंगन  में।
जब वो गया तो सब कुछ यारो सूना सूना छोड़ गया।

इस आईने की किरचों को मरते दम तक साथ रखो।
‘गुलशन’ जिसको चाहने वाला बिखरा बिखरा छोड़ गया

आईना ए गुलशन – 89 – गुलशन ख़ैराबादी

सर जहां ख़ुद ब ख़ुद न झुक जाए

ज़िन्दगी क्या है ये ज़माना क्या।
उम्र को बे  सबब  गंवाना क्या।।

काम  आए किसी के तो बेहतर।
अपनी हस्ती को यूं मिटाना क्या।।

जब मोहब्बत की मिल गई दौलत।
इस से बढ़कर कोई ख़ज़ाना क्या।।

सर जहां ख़ुद ब ख़ुद न झुक जाए।
आस्ताना   वो   आस्ताना     क्या।।

दश्तो  सहरा  का  हूं मुसाफ़िर  मैं।
आबले  पांव  के  दिखाना   क्या।।

दिल दिया है   तो  जान  भी  देंगे।
इश्क़ वालों को  आज़माना क्या।।

बैठ  कर  सोचिए   ज़रा   ‘गुलशन’।
जुज़ अमल के हैं साथ जाना क्या।।

आईना ए गुलशन – 90- गुलशन ख़ैराबादी

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