मश्क़ ए सुख़न को जारी रखना। Maske Sohan ko jari rakhna।


मश्क़ ए सुख़न को जारी रखना।
गुलशन बात हमारी रखना।।

फूल  अगर  हैं  महकाने  तो।
गोड़ के अपनी क्यारी रखना।।

इल्म अगर हासिल करना है।
मेहनत पैहम  जारी  रखना।।

फ़न की क़ीमत यूं न मिलेगी।
ग़ज़लों  को  मेआरी  रखना।।

शोला शिफ़त हों लफ़्ज़ तुम्हारे।
फ़िक्र  में  वो  चिंगारी  रखना।।

जाने कब आ जाए बुलावा।
चलने  की  तैय्यारी रखना।।

उर्दू की तो शान  है ‘गुलशन’।
ख़ुशबू  प्यारी-प्यारी रखना।।

आईना ए गुलशन 91 गुलशन ख़ैराबादी

नफ़रत के लिए है न किसी शर के लिए है।
क़ुरआन का पैगा़म तो हर घर के लिए है।।

अब मुझको अंधेरा जो मिला कौन सा शिकवा।
हर लम्हा ए अनवार तो दिलबर के लिए है।।

हक़दार बराबर हैं फ़कीरी में करूं क्या।
बच्चों में ये झगड़ा मेरी चादर के लिए है।।

मंज़िल है कहां किसको ख़बर काफ़िले वालो।
ये   काम   हमारा  नहीं   रहबर   के  लिए  है।।

मिलती है जहां क़ल्ब को तस्कीन बराबर।।
ये सर भी मेरा वक्फ़ उसी दर के लिए है।।

हमने तो वसीयत में बहुत साफ़ लिखा था।
जो कुछ है मेरे पास वो दुख़्तर के लिए है।।

हम जिसको फ़क़त सिर्क ही समझा किए ‘गुलशन’
सर गैर का अब  भी  उसी  पत्थर के लिए है।।

आईना ए गुलशन  92 गुलशन ख़ैराबादी

मैं  कहां  जी  पाऊंगा तेरे चले जाने के बाद।
जीते जी मर जाऊंगा तेरे चले जाने के बाद।।

आंख से अश्कों की लड़ियां गिर पड़ेंगी टूट कर।
दिल को जब समझाऊंगा तेरे चले जाने के बाद।।

ज़िन्दगी की राह में होंगी  बड़ी  दुश्वारियां।
मैं बहुत घबराऊंगा तेरे चले जाने के बाद।।

आलम ए बेचारगी  में  तुझको   ढूंढ़ेगी   नज़र।
घर में जब जब आऊंगा तेरे चले जाने के बाद।।

मयकदे की सम्त जाऊंगा अगर मैं भूल कर।
रिंद  ही  कहलाऊंगा तेरे चले जाने के बाद।।

मुझको भी मालूम है तक़दीर का लिक्खा हुआ।
ठोकरें  ही  खाऊंगा  तेरे  चले जाने के बाद।।

क्या ख़बर थी एक दिन ऐसा भी ‘गुलशन’ आएगा।
सर  ही  बस  टकराऊंगा तेरे चले जाने के बाद।।

आईना ए गुलशन  93  गुलशन ख़ैराबादी

कहीं  घोड़े  बनाता  हूं  कहीं  ख़ंजर  बनाता  हूं।
“मैं काग़ज़ के सिपाही काटकर लश्कर बनाता हूं”

कभी जाएंगी अपने घर किसी की ये बहू बनकर।
पढ़ाकर  बेटियों  को  अपनी  दीदावर  बनाता हूं।।

ये मंज़र खूब है  इक मयकदे का कोई देखे तो।
कहीं पर ख़ुम बनाता हूं कहीं साग़र बनाता हूं।।

कहीं घर डूबते हैं तो कहीं छप्पर खिसकते हैं।
मैं अपने गांव में सैलाब का  मंज़र  बनाता हूं।।

उसी के साथ लूट जाता है अक्सर कारवांने दिल। जिसे मैं  आज  अपनी  राह का रहबर बनाता हूं।।

जिसे मैं  फूल कहता था गुलिस्ताने मोहब्बत का।
न  जाने  क्यों  उसे अब राह का पत्थर बनाता हूं।।

ग़रीबी भुकमरी जो दूर कर दे मुल्क से ‘गुलशन’।
उसी को सोच कर मैं आज का रहबर बनाता हूं।।

आईना ए गुलशन   94  गुलशन ख़ैराबादी

देख जब भी अपने पैग़म्बर को देख।
मानकर अख़लास के पैकर को देख।।

किस  क़दर  मजबूर ओर  महक़ूम हैं।
ऐ अमीर ए शहर  इस मंज़र को देख।।

मांगता  है  सर छुपाने की जगह।
हाथ फैलाए हुए बे घर को देख।।

भूक  ओर  अफ़लास  के  मारे हुए।
दौड़ पड़ते हैं किसी लंगर को देख।।

पी चुका हूं उनकी नज़रों से बहुत।
होश खो देता हूं मैं साग़र को देख।।

चाहता   है   तू   अगर    मंज़िल   मिले।
हक़ पे जो चलता है उस रहबर को देख।।

याद आ जाती है ‘गुलशन’ मुफ़्लिसी।
बे कसओ नादार के बिस्तर को देख।।

आईना ए गुलशन  95  गुलशन ख़ैराबादी

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