Pyasa jarur hun Magar itna nahin Hun main प्यासा जरूर हूं मगर इतना नहीं हूं मैं।

बढ़ा  जो  प्यार का ये दायरा मालूम होता है।
जुनूने शौक़ का ये इरतिका़ मालूम होता है।।

मेरा महबूब मुझसे कुछ ख़फा़ मालूम होता है।
यही है वो अदा जिससे भला मालूम होता है।।

मेरी  ही आंख में आंसू  नहीं हैं याद  से  तेरी।
तेरा दामन भी तो भीगा हुआ मालूम होता है।।

मेरे औराक़े माज़ी को उलट कर देखते हो तुम।
तुम्हारी याद का ये सिलसिला मालूम होता है।।

कहां तक इसको रोऊं मैं कहां तक सर को पटकूं मैं
बला  से  मेरी  वो मुझसे  ख़फा़ मालूम होता है ।।

जो साक़ी दे रहा है जाम भर कर आज रिंदोंं को।
हमारा  नाम  भी  इसमें  लिखा मालूम होता है।।

न जाने किसकी नज़रों का करम है मेरे गुलशन पर।
“जो  नज़्मे  गुसितां बदला हुआ मालूम होता है”

   आईना ए गुलशन……41….गुलशन ख़ैराबादी

इश्क़ जब नहीं दिल में फिर तेरी हक़ीक़त क्या।
लाख  तू  करे  सज्दे  ये   तेरी   इबादत  क्या।।

गर्मियों के मौसम में दिल को भी है राहत क्या।
प्यास  है  मोहब्बत  की आपकी जरूरत क्या।।

कैसे   मर हले   आए  ज़िन्दगी  की  राहों में ।
दिल में जब मोहब्बत है दोस्तो बगावत क्या ।।

आज  सर्द  मौसम में लफ़्ज़ जम गए हैं जो ।
कल जरूर पिघलेंगे बर्फ़ की हक़ीक़त क्या ।।

रौशनी जो  बिख़री है  उसके नूर की हर सू ।
रूह  के  अंधेरे  में  चांद  की  ज़रूरत क्या।।

धूल  अब  के  सावन में उड़  रही  है ऐ गुलशन।
“इस अजीब मौसम पर बोलो तुझको हैरत क्या”

   आईना ए गुलशन……42……गुलशन ख़ैराबादी

चांद  तारों  पे  है सफ़र अपना।
यानी होगा वहां भी घर अपना।।

जब भी मुफ़्लिस को देखता हूं मैं।
याद आता  है  वो खंडर अपना।।

दिल  पे  गुज़रा  है सानिहा ऐसा।
रह गया थाम कर जिगर अपना।।

दिल में  मेहमान बन के बैठा है।
वो यक़ीनन है चारागर अपना।।

जिस जगह होगी मंज़िले मकसूद।
खत्म  होगा  वही  सफ़र अपना।।

लौट कर वक़्त फिर नहीं आता।
“लम्हा लम्हा है मोतबर अपना”

वो भला है कि अब बुरा गुलशन।
खुद चुना  हमने राहबर अपना।।

आईना ए गुलशन…43..गुलशन ख़ैराबादी

दिल से दिल का कोई रिश्ता नहीं रहने देता।
बुल  हवस  प्यार  किसी का नहीं रहने देता।।

जब भी गुलशन में कभी दौरे ख़जा़ं आता है।
पेड़  पर  एक  भी  पत्ता   नहीं   रहने   देता।।

कोई अच्छा की बुरा हो वो है राज़िक़ सबका।
वो   किसी  को  यहां  भूखा  नहीं  रहने देता।।

नूरे  तौहीद  से  है  क़ल्ब  मुनव्वर  जब  से।
दिल  की  बस्ती  में  अंधेरा  नहीं रहने देता।।

मुफ़्लिसी  भी अजब इंसान की मजबूरी है।
कर्ज़ अपनों को भी अपना नहीं रहने देता।।

हर दम आबाद रहा करती है दिल की बस्ती।
“उसका  एहसास  अकेला  नहीं   रहने  देता”

हां वही वक्त़ का सूरज है जहां में गुलशन।
जो  किसी  सम्त  अंधेरा  नहीं  रहने देता।।

   आईना ए गुलशन..44..गुलशन ख़ैराबादी

अब तक रहे हयात में   भटका नहीं हूं मैं।
जब से हुआ हूं आपका अपना नहीं हूं मैं।।

खै़रात   मैंकदे  की  तो पीता नहीं हूं मैं।
प्यासा  जरूर हूं मगर इतना नहीं हूं मैं।।

लम्हा शबे  फ्राक़  का  ऐसा  नहीं  कोई।
मिलकर जो तेरी याद से रोया नहीं हूं मैं।।

शैराब करता रहता हू मैं दिल की खेतियां।
दरिया की तरह बहता हूं सहरा नहीं हूं मैं।।

यूं तो हर इक नज़र में हूं मैं  बहरे  बे करां।
लेकिन किसी की प्यास बुझाता नहीं हूं मैं।।

साए की तरह रहती है हर लम्हा तेरी याद।
“तन्हाईयों   में  रह  के  भी तन्हा नहीं हूं मैं”

गुलशन हर एक फूल पर भंवरे तो है निसार।
फिर भी वो कह रहे हैं कि महका नहीं हूं मैं।।

  आईना ए गुलशन..45..गुलशन ख़ैराबादी

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *