क़ुरआन वो जहां में मुकम्मल किताब है। Quran vah Jahan mein mukmmal kitab hi.


किसी से शिक्वा न हमको कोई शिकायत थी।
हमारे  दिल  में  सभी  के  लिए  मोहब्बत थी।।

वो  कोई  छोटा  बड़ा  हो  कि हो कोई मजबूर।
भलाई  करना  सभी  से  हमारी  फ़ितरत थी।।

जो  अजनबी  थे  वही  मेरे   पास  आए  थे।
जरूर  फ़सले  बहारां  की  कुछ शरारत थी।।

बना  है  आज  वही  मेरी  जान  का  दुश्मन।
न  दोस्ती थी न  जिससे कोई  अदावत थी।।

न जाने किसकी नवाज़िश का ये नतीजा था।
“घने  दरख़्त  के  नीचे  अजीब   हैबत  थी”

पढ़ो  लिखो गे  बनोंगे   नवाब  तुम  बच्चों।
हमारी  आज  सभी  से  यही नसीहत थी।।

न भूल पाएंगे शफ़्क़त किसी की हम ‘गुलशन’
करम था उनका जो हम पर पड़ी मुसीबत थी।।

आईना ए गुलशन..67..गुलशन ख़ैराबादी

जो सुलगते  हुए  सहर से गुज़र जाते हैं।
बस वही लोग ज़माने में निखर जाती हैं।।

क्या समझते हो कि आसान है चलना इस पर।
इश्क़  की राह में दिल, जान, जिगर, जाते हैं।।

हादसा कोई भी हो बैठ कर सोचा है कभी।
जितने इल्ज़ाम हैं क्यों आपके सर जाते हैं।।

बेखुदी  पांव  से  लिपटी  है  ख़ुदा  खै़र  करे।
उनको जाना था किधर और किधर जाते हैं।।

क्या डराएगी हमें मौज ए बला दरिया की।
पांव  में  बांध  के हम लोग भंवर जाते हैं।।

जिससे मिलता है सुकूं हमको हमारे दिल को।
उसके  दरबार  में  हम  शामो  सहर  जाते हैं।।

उनकी दहलीज़ के इकराम हैं ‘गुलशन’ कितने।
जिनके  बिगड़े  हैं  मुक़द्दर  वो  संवर  जाते हैं।।

आईना ए गुलशन..68..गुलशन ख़ैराबादी

ज़रा सी बात पर ये क्या हुआ है।
कि चेहरा ही तेरा उतरा हुआ है।।

ख़ता दिल की है आंखों से कहूं क्या।
मेरा  दामन  जो  ये  भीगा  हुआ है।।

मिलेगी रोशनी हर राह  रव को।
दिया जो राह में जलता हुआ है।।

जुनूने शौक़ उसका हद से गुज़रा।
तेरे  गेसू  में जो  उलझा हुआ है।।

ये बाम ओं दर सभी सूने पड़े थे।
तेरे आने से घर महका हुआ है।।

बिठाऊं किस तरह अब दिल में उसको।
नज़र   से  जो  मेरी  उतरा हुआ है।।

किसी दिन सामने आएगा ‘गुलशन’
तेरे  बारे  में  जो  सोचा  हुआ  है।।

आईना ए गुलशन..69…गुलशन ख़ैराबादी

सर से ज़ुनून  इश्क़  का  यारो  उतर  गया।
शीशा था दिल हमारा जो टूटा बिखर गया।।

क्या हो गया है आज तुझे ऐ ग़म ए हयात।
इक तू ही मेरे साथ था तू भी किधर गया।।

किसकी सुआए लुत्फ़ो करम मुझपे पड़ गई ।
ज़र्रा  था  आफ़ताब  की  सूरत  निखर गया।।

मुझको तो कुछ ख़बर ही नहीं माजरा है क्या।
नज़रों  से  उसकी  आज  मैं  कैसे  उतर गया।।

सूना  था  जैसे  प्यार  मोहब्बत  का  हौसला ।
“तप कर गमों की आंच में कुछ तो निखर गया”

बैठा हूं  सुब्ह  से  मैं  इसी  सोच  में  जनाब।
सपना  मेरी  हयात  का  कैसे  बिखर  गया।।

रोशन हुआ जो एक ग़ज़ल ओर सही का राज़।
‘गुलशन’ भी आफ़ताब के जैसा निखर गया।।

आईना ए गुलशन..70…गुलशन ख़ैराबादी

दुनिया में उसका नूर है ओर बे हिसाब है।
जो ज़र्रा है वो अपनी जगह आफ़ताब है।।

ता  हशर इसमें  होगी  न  तरमीम दोस्तो!
कुरआन वो जहां में मुकम्मल किताब है।।

हम आईना बनें तो यक़ीनन उठेगा  वो।
चेहरे पे उसके आज पड़ा जो नक़ाब है।।

कुदरत  की  है  ये कारीगरी देखिए जनाब।
कांटो के बीच आज भी खिलता गुलाब है।।

तुझ पर जो हो गया है दिलो जान से फ़िदा।
दुनिया  में  सिर्फ  ऐसा  बशर  कामयाब है।।

जो बिन पिए ही झूम उठें सारे बादाकश।
साक़ी मुझे  बता  कोई  ऐसी  शराब  है।।

‘गुलशन’ मेरे नज़र से तो देखे कोई तुझे।
चेहरे पे कितना नूर है ओर  बेहिसाब  है।।

आईना ए गुलशन..71..गुलशन ख़ैराबादी

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