तमाम उम्र रहा ज़लज़लों में घर अपना। Tamam umr rha zal zalon main Ghar apna – Urdu shayari

जो दिल दिया था उसका सिला दे गया है कौन।
ये   दर्द   मुझको   तेरे    सिवा दे गया है कौन।।

जब  तू  नहीं  तो  और  भला  दे गया है कौन।
रातों  में  जागने   की  सज़ा   दे गया है कौन।।

चाहा था जो भी सब वो मिला दे गया है कौन।
अल्लाह मुझको   तेरे सिवा   दे गया है कौन।।

बुझती   नहीं   है  प्यास  ये  इल्मो शऊर की ।
तिशना  लबी  को मेरे   खुदा दे गया है कौन।।

जिस बात की है मुझको खबर क्या तुझे भी है।
तू   दर्द   दे  गया  था  दवा  दे  गया है कौन ।।

वो  दर्द   और   कर्ब  कि   जीना   मुहाल  है ।
उम्र  ए  दराज़ की ये   दुआ  दे गया है कौन।।

इस दर्जा क्यों है जान ये गुलशन मुझे अज़ीज़।
मुझको  ये मुश्क  बार  फ़जा दे  गया है कौन।।

             

आईना ए गुलशन 36  गुलशन ख़ैराबादी

सब्ज़ ओ गुल का रंग बदलते देखा है ।
“तितली  को फूलों पे  मचलते देखा है”

कब रहता है एक जगह पर कोई उरूज ।
शाम   हुई    सूरज  को  ढ़लते   देखा है।।

ज़ालिम   तेरी  आंख  में  ये आंसू कैसे?
घड़ीयाली  चेहरों  को बदलते देखा है।।

शर्मो हया के फूल जहां खिलते थे वहीं।
बेशर्मी   को  फूलते   फलते   देखा है।।

हर ज़ालिम को अहले वफ़ा ने दुनिया में।
नफ़रत  की  ही  आग उगलते  देखा है ।।

पीते हैं कुछ लोग  बहक  भी  जाते  हैं।
ऐसों को भी गिर के संभल ते देखा है।।

अपने जुनूने शौक़ में अब तक तो गुलशन।
हर  आशिक़  को  आग  पे चलते देखा है।।

          

आईना ए गुलशन 37  गुलशन ख़ैराबादी

चलो कि सहने चमन में टहल के देखते हैं।
ज़रा मिज़ाज हम अपना बदल के देते हैं।।

नजर से हटता नहीं है वो झील का मंज़र।
हसीन फूल खिले हैं कमल के देखती हैं।।

हमेशा रहता है मौसम वहां मोहब्बत का।
कि सूए  वादी ए कश्मीर  चल के देते हैं।।

जब आईना है मुक़ाबिल समर ने खुद को।
ग़म ए  हयात की सूरत बदल के देखते हैं।।

कहां  वो  प्यार  के नग़मे विसाल की बातें।
सुनहरे ख्वाब यहां लोग कल के देखते हैं।।

नसीब  होता  नहीं एक घर भी  ऐ गुलशन।
हसीन ख्वाब तो हम भी महल के देखते हैं।।

सुना है दर पर मिलेगा उसी के सब गुलशन।
चलो दयार में अब उसकी चल के देखते हैं।।

            

आईना ए गुलशन 38  गुलशन ख़ैराबादी

रोज़  ख्वाबों में  मेरे आगे सताते क्यों हो।
चैन से सोने दो रातों को जगाते क्यों हो।।

कोई शिकवा है अगर आओ क़रीब आके कहो।
दूर से तंज़ के तुम तीर चलाते क्यों हो।।

देख सकते हो नहीं दीवानगी मेरी जब तुम।
मुस्कुरा  कर  मुझे दीवाना बनाते क्यों हो।।

गर नहीं नाला ओ फ़रियाद की हिम्मत तुम में।
खून ए  मजलूम पे फिर अश्क बहाते क्यों हो।।

लोग कहते हैं जो दीवाना तो सच कहते हैं।
“तुम हवाओं में चिरागों को जलाते क्यों हो”

ये  न  समझे  हैं  न  समझेंगे  तुम्हारी   बातें।
भी ज़मीरों को तुम आईना दिखाते क्यों हो।।

मर गया जज़्ब ए एहसास है जिनका गुलशन।
क़िस्सा ए  दर्द उन्हें  जा  के  सुनाते  क्यों हो।।

            

आईना ए गुलशन 39  गुलशन ख़ैराबादी

तुम्हारी याद में गुज़रा है ये सफ़र अपना।
रहा है इश्क़ में हरगाम मोतबर अपना।।

हसीन वादी से जब भी हुआ गुज़र अपना।
हमें संभाल के रखना पड़ा जिगर अपना।।

करम है उसका नवाज़िश है उसकी ये मुझ पर।
कभी न  ग़ैर के आगे झुका जो  सर  अपना।।

न रोक पाए जब आंखों से अश्क हम अपने।
हुआ है भीग के दामन भी तरबतर अपना।।

मिला है जो भी बुजुर्गों की ये नवाज़िश है।
लुटाऊ कैसे मैं हाथों से मालो ज़र अपना।।

तुम्हारा साथ रहेगा तो ये भी मुमकिन है।
बड़े सुकून से कट जाएगा सफर अपना।।

कभी सुकून मयस्सर न हो सका गुलशन।
“तमाम उम्र रहा ज़लज़लों में घर अपना”

             

आईना ए गुलशन 40  गुलशन ख़ैराबादी

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