उंगलियां यूं न सब पर उठाया करो। Ungaliyan you Na Sab par uthaya karo

दुनिया में उसका नूर है ओर बेहिसाब है।
जो ज़र्रा है वो अपनी जगह आफ़ताब है।।

ता हशर उसमें होगी ना तरमीम दोस्तो।
कुरआन वो जहां में मुकम्मल किताब है।।

हम आईना बने तो यक़ीनन उठेगा वो।
चेहरे पर उसके आज पड़ा जो नक़ाब है।।

कुदरत की है ये कारीगरी देखिए जनाब।
कांटो के बीच आज भी खिलता गुलाब है।।

तुझ पर जो हो गया है दिलों जान से फ़िदा।
दुनिया में सिर्फ़  ऐसा बशर   कामयाब है।।

जो बिन पिए ही झूम उठें सारे बादाक़श।
साकी़ मुझे   बता कोई   ऐसी शराब है।।

‘गुलशन’ मेरी नज़र से तो देखे कोई तुझे।
चेहरे पे कितना नूर है  ओर बे हिसाब है।।

आईना ए गुलशन..71..गुलशन ख़ैराबादी

शाम  होते  ही  चरागो़ं  सा  जला करता था।
दिल भी पैग़ाम उजालों का दिया करता था।।

उनसे शिक्वा ही किया और न फ़रियाद कभी।
मैं तो बस उनसे मोहब्बत ही किया करता था।।

कितने  ही  जीते  हैं  गै़रों  का  सहारा लेकर।
मैं तो क़िस्मत के भरोसे पे जिया करता था।।

तू तो साकी़ था पिलाना था फ़क़त काम तेरा।
और  मैं  रिंद  बला  नोश  पिया  करता  था।।

जानता कुछ भी न था  प्यार मोहब्बत क्या है।
फिर भी महबूब से  मैं  रोज़  मिला करता था।।

इश्क़  में  जान  भी  देते  थे  कभी  दीवाने।
ये सदाक़त भी बुजुर्गों  से सुना करता था।।

वो शज़र दिल का था ‘गुलशन’ जो बईं हुस्ने ख़्याल। ज़र्द  होते  हुए  मौसम  को  हरा  करता  था।।

आईना ए गुलशन..72..गुलशन ख़ैराबादी

नक़्शा सफ़र का उससे बदलता नहीं कोई।
लेकर जो अज़्म घर से निकलता नहीं कोई।।

पहुंचा रहा है रिज़्क़ सभी को वो हस्बे हाल।
राज़िक़ न रहम करता तो पलता नहीं कोई।।

क्या बात  है  कि ठोकरें खाता है हर तरफ़।
गिरता है और फिर भी संभलता नहीं कोई।।

आता नहीं ख़्याल किसी का मेरी तरफ़।
उनवान बन के शेर में ढ़लता नहीं कोई।।

जुज़  इक तेरे  ख़्याल के  राहे  हयात में ।
अब मेरे साथ साथ भी चलता नहीं कोई।।

इस दर्दे कशमकश में अजब हाल हो गया।
राहे वफ़ा में  आज  निकलता  नहीं  कोई।।

ये इश्क़ का जुनूं नहीं ‘गुलशन’ तो फिर है क्या।
यादों के साथ दिल से  निकलता नहीं  कोई।।

आईना ए गुलशन..73..गुलशन ख़ैराबादी

74.
तू है अफ़ज़ल तो मैं भी आला हूं।
तेरे  जैसा   ही   भोला   भाला हूं।।

भीड़ लगती है मुझ में शामो सहर।
चाहतों  का  अजब  शिवाला हूं।।

देख  लेता हूं खुद में दुनिया को।
मैं भी  जमशेद  का  प्याला  हूं।।

वो जो आंखों में है उसी को मैं।
दिल में मेहमान रखने वाला हूं।।

सूरत  ए  आफ़ताब  उभरा  मैं।
यानी  हर सू  चमकने वाला हूं।।

क्या निकालेगा तू मुझे घर से।
मैं  तेरे  दिल में रहने वाला हूं।।

वो पुराने ख़्याल थे ‘गुलशन’।
अब नए शेर कहने वाला हूं।।

आईना ए गुलशन..74..गुलशन ख़ैराबादी

सब्ज़ वादी में गुलशन की आया करो।
रोज़ शबनम में तुम भी नहाया करो।।

जिसने अरमान तुम पर निछावर किए।
दिल जिगर जान उस पर लुटाया करो।।

चाहतों का तो है बस तका़जा़ यही।
जब  मनाया  करें मान जाया करो।।

टूट सकते हैं आख़िर हम इंसान हैं।
हर तरह से न हमको सताया करो।।

होश की बात करता रहूं उम्र भर।
जाम कोई तो ऐसा पिलाया करो।।

पहले अपने  गरेबान  में झांक लो।
उंगलियां यूं न सब पर उठाया करो।।

खुद ब खुद मेरी क़िस्मत संवर जाएगी।
तुम जो हर रोज़ ‘गुलशन’ में आया करो।।

आईना ए गुलशन..75..गुलशन ख़ैराबादी

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