बज़्म ए गुलशन खै़राबाद का तरही मुशायरा 2022

ख़ैराबाद सीतापुर बज़्म ए गुलशन अदबी तन्ज़ीम खै़राबाद की जानिब से तरही मुशायरा मुनक़्क़िद हुआ।
जिसकी सदारत डॉ अज़ीज़ खै़राबादी और निजा़मत के फ़राइज मजाज़ सुल्तानपुरी ने अंजाम दिए।
जिसका मिसरा ए तरह था ।
“दिल हुए जाते हैं इस दौर में पत्थर की तरह” पर हुआ जिन शोरा ए इकराम ने कलाम पेश किया वो नजर ए कारईन हैं।

बोल सकते हैं ये पत्थर भी अजब क्या है अज़ीज़।
शर्त है कोई पुकारे तो पयंबर की तरह।।
अज़ीज़ खै़राबादी

हालत ए ज़ार पे ऐ आतिफ़ ए दिल गीर तेरी।
मेहरबां कौन ‌हुआ ख़ालिक़ ए अकबर की तरह।।
रेहाना आतिफ़ खै़राबादी

किस तरह करलूं किसी की मैं क़यादत मंजूर।
राहबर भी तो कोई हो मेरे रहबर की तरह।।
ज़ियाउद्दीन ज़िया खै़राबादी

इक ग़म ए यार ही था मोनिस ओ ग़म ख़्वार मेरा।
वो भी अब रूठ गया मेरे मुक़द्दर की तरह।।
मास्टर निसार अहमद निसार खै़राबादी

जिन की तक़दीर में लिक्खी है ग़रीबउल वतनी ।
कैसे आराम मयस्सर हो उन्हें घर की तरह ।।
मजाज़ सुल्तानपुरी

राहरव पायें जिसे देख के मंज़िल का सुराग़।
नक़श ए पा कोई तो हो मील के पत्थर की तरह।।
नफ़ीस खै़राबादी पानीपत

जो भी मां-बाप की ख़िदमत नहीं करते वो लोग।
ठोकरें खाते हैं बस राह के पत्थर की तरह।।
गुलशन खै़राबादी

बस इसी फ़िक्र में रहता हूं मैं सर गर्म ए अमल।
काश हो जाए मेरा घर भी कभी घर की तरह।।
मसऊद महमूदाबादी

लफ़्ज़ दर लफ़्ज़ सजाता हूं ग़ज़ल कहता हूं।
मैं भी रहता हूं ज़माने में सुख़नवर की तरह।।
मौलाना अतहर कमलापुरी

ऐ सनम तेरी क़सम मस्त क़लन्दर की तरह।
बे खुदी ओढ़ के घूमा किए बे घर की तरह।।
विवेक मिश्रा राज़ खै़राबादी

फ़सल ए उम्मीद है अब ख़्वाब के मन्ज़र की तरह।
क्या ज़मीं हो गई इस दौर में बन्जर की तरह।।
महबूब खै़राबादी

कल जो फिरते थे सर ए राह गदागर की तरह।
आज वो साहिब ए मसनद हैं सिकंदर की तरह।।
क़मर खै़राबादी

यूं तो देखे हैं ज़माने में हसीं कितने ही।
कौन है कोई बताए मेरे दिलबर की तरह।।
शफा़अत खै़राबादी

नूर ए ईमां से मुनव्वर तो करो दिल अपना।
तुम नज़र आओगे बाहर से भी अन्दर की तरह।।
मिर्जा इक़रार हुसैन इक़रार खै़राबादी

वो जो दिल लूट लिया करता था हर महफ़िल में।
आज फिर मुझको मिला राह में रहबर की तरह।।
राजेन्द्र प्रसाद रंचक खै़राबादी

कैसे रोकेगा भला कोई भी तूफ़ानों से।
जीतने का है जुनूं जिसमें सिकंदर की तरह।।
दिलशाद रखौनवी

देर से है मेरे कमरे में ये खुशबू कैसी।
कौन है मेरे तसव्वर में गुल ए तर की तरह।।
अख़्तर मुजीबी खै़राबादी

उसकी मख़मूर निगाहों में अजब जादू था।
वो सरापा था फ़क़्त चांद के पैकर की तरह।।
मुईन अल्वी खै़राबादी

दिल से दिल हाथों को हाथों से मिलाते रहिए।
मुल्क में रहना है हम सबको बिरादर की तरह।।
मिर्जा इसरार हुसैन इसरार खै़राबादी

रात इक ख़्वाब था किस सोख़ का हैरान हूं मैं।
सुब्ह दम उड़ गया आंखों से कबूतर की तरह।।
रईस रहमानी खै़राबादी

वक़्फ़ कर देते हैं जो राहे वफ़ा में हस्ती।
मस्त हर हाल में रहते हैं कलंदर की तरह।।
जैद खै़राबादी

इन के अलावा मतलूब खै़राबादी और दिनेश कुमार खुर्शीद खै़राबादी ने कलाम पेश किया।
इस मौक़े पर नायाब ग़ौरी अख़लाक अहमद अंसारी रियासत अली ग़ौरी शराफ़त अली लियाक़त ग़ौरी वगैरा मौजूद रहे।

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