अब उनसे जाके ये क़ासिद प्याम कह देना। Ab unse jak ya qasid payam kah dena


अब उनसे जा के ये क़ासिद प्याम कह देना।
तड़प  रहा  है   तुम्हारा   ग़ुलाम  कह  देना।।

ये  जिस्म  और  जिगर  अपनी जां तो पहले थी।
ये दिल भी कर दिया अब उसके नाम कह देना।।

तुम्हारे  एक  न  होने  से  घर  हुआ  वीरान।
बदल  के  रह  गया सारा निज़ाम कह देना।।

अगर  हो  जाना कभी उनके आस्ताने पर।
तो इस ग़रीब का अदना सलाम कह देना।।

लिखे थे ख़त जो सभी हिज्र में कभी न कभी।
वो जल के ख़ाक  हुए  हैं  तमाम  कह देना।।

मैं आ रहा था मोहब्बत की पालकी ले कर।
बिगड़  गया  है  मेरा ताम  झाम  कह देना।।

मैं आ गया जो कहीं ज़िद पे अपनी ऐ ‘गुलशन’।
करूंगा  जाहो  हशम उनके  नाम  कह देना।।

आईना ए गुलशन 121  गुलशन ख़ैराबादी

आह जो दिल पर लगा तेरी नज़र का तीर है।
दर्द कुछ ऐसा बढ़ा जो आज आलम गीर है।।

सारे अख़लास ओ वफ़ा गुम हो गए जाने कहां।
अब  हमारे  दिल  में  बस रौशन तेरी तस्वीर है।।

जब भी देखा जिसने देखा ऊंची मंज़िल की तरफ़।
क्या  ग़रीबों  के  भी  ख़्वाबों  में  कोई  तामीर  है।।

क्या मिटा सकता है क़ुदरत के लिखे को कोई अब।
क्या पढ़ेगा तू जो  क़िस्मत  की  लिखी  तहरीर है।।

बट गया सब राहे हक़ में जो मिला था आज तक।
फिर मिला उस  से  सिवा ये बाइस ए तौक़ीर  है।।

मां के आंचल  में  सदा मिलता  है बच्चों को सुकूं।
और  ये आंचल  ही  मां का शरबत ए अक्सीर है।।

दे  गया  ‘गुलशन’  दुआएं  ज़िन्दगी  की  ख़ैर हो।
वो  फ़रिश्ता था  ख़ुदा  का  या  तो  कोई पीर है।।

आईना ए गुलशन  122  गुलशन ख़ैराबादी

हाय  क्या  हुस्न क्या जवानी है।
तुझ पे क़ुदरत की मेहरबानी है।।

मैं हूं क्या और मेरी दुनिया क्या।
मैं भी  फ़ानी हूं ये भी  फ़ानी है।।

कोई हंसता तो रो रहा है कोई।
ज़िन्दगी  की  यही  कहानी  है।।

शहर जा कर मुझे ख़्याल आया।
किस  क़दर  क़ीमती ये पानी है।।

काम  करते चलो कोई बेहतर।
साथ जब तक तेरी जवानी है।।

फूल   खिलते   हैं   मुस्कुराते  हैं।
फ़सले गुल किस क़दर सुहानी है।।

कोई ग़फ़लत हुई कहीं ‘गुलशन’।
कितनी मुश्किल में ज़िन्दगानी है।।

आईना ए गुलशन 123 गुलशन ख़ैराबादी

आ भी जाओ ये क़ुदरत का इनआम है।
महकी   महकी  हुई  आज  की शाम है।।

है  जो  उर्दू  से   निस्बत  चले   आइए।
बज़्में  शेरो सुख़न आज फिर आम है।।

जो भी ख़िदमत करे अपने मां बाप की।
उसको  जन्नत  मिलेगी  जो बे  दाम है।।

मैं    ख़ता   कार  हूं   मैं    गुनहगार   हूं।
आज अपनों का मुझ पर ये इल्ज़ाम है।।

ख़ेमा ए जां  से   उठने   लगा   है   धुआं।
आज ग़ैज ओ  ग़ज़ब की अजब शाम है।।

जब से साक़ी  ने अपनी नज़र  फेर ली ।
किसको दिखलाऊं  ख़ाली मेरा जाम है।।

फिर दुआ है कि शोहरत तेरी आम हो।
फिर  बुलन्दी पे ‘गुलशन’ तेरा नाम है।।

आईना ए गुलशन 125 गुलशन ख़ैराबादी

मेरी  दुआ  है  कुछ ऐसा अजीब हो जाए।
मुझे भी इल्म की दौलत नसीब हो जाए।।

मैं जिसको चाहूं वो मेरा हबीब  हो जाए।
ख़ुदा  करे  मिरा  ऐसा  नसीब  हो  जाए।।

नफ़स नफ़स में समा जाए यूं वफ़ा की महक।
जो   मुझसे  दूर   है  मेरे   क़रीब  हो   जाए।।

अब उस मक़ाम पे बीमार ए इश्क़ आया है।
परीशां   हाल  जहां  ख़ुद  तबीब  हो जाए।।

नवाज़  दे  मुझे  इल्म ओ  शऊर से  या  रब।
करम  हो  जिस  पे  तेरा वो अदीब  हो जाए।।

नसीब हो न अगर उसको इल्म की दौलत।
अमीर ए  शहर यक़ीनन  ग़रीब  हो  जाए।।

जो थे क़रीब वही आज सब हैं गुलशन में।
हुआ  करे  जो  कोई अब रकी़ब हो जाए।।

आईना ए गुलशन 128  गुलशन ख़ैराबादी

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