दुनिया ए मोहब्बत में अलम देख रहे हैं। duniya Mohabbat mein Alam dekh rahi hain

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कोई क्या समझे हक़ीक़त क्या हूं मैं।
“अज़मत ए आदम का आइना हूं मैं”

दोस्त  हो  या  हो  कोई दुश्मन मेरा।
हर किसी से आज भी मिलता हूं मैं।।

उस घड़ी हमको मिला सब्रो क़रार।
जिस घड़ी उसने कहा तेरा हूं मैं।।

कौन सुनता है यहां अपने सिवा।
पत्थरों  के  शहर  में रहता हूं मैं।।

लौट  आए  हैं  परिंदे   शाख़  पर।
अब तुम्हारी राह को तकता हूं मैं।।

रहम फ़रमा अब तू  मेरे हाल पर।
ऐ ख़ुदा  आख़िर  तेरा  बंदा  हूं मैं।।

इल्म की दौलत मिली ‘गुलशन’ मुझे।
फिर भी है एहसास कुछ प्यासा हूं मैं।।

आईना ए गुलशन…57….गुलशन ख़ैराबादी

फ़सले गुल जब कभी गुलशन पे नज़र करती है।
ग़न्चे   ग़न्चे  की  महक दिल पे असर करती है।।

ज़ीस्त तन्हाई के सहराओं में तपती है मगर।
“रात  अंगारों  के  बिस्तर  पे बसर करती है”

काम से लौटके जब शाम को घर आता हूं।
लहर बच्चों  में मुसर्रत की गुज़र करती है।।

भूल जाता  है  जब इंसान  इबादत  तेरी।
फ़िक्र दुनिया की उसे ज़ेरो ज़बर करती है।।

मैं जो ठहरूं भी किसी मोड़ पे क्या फ़र्क़ कोई।
मेरी  तख़्ईल  तो  हर  सम्त सफ़र करती है।।

तुमने  सोचा  है  कभी  हम तो यही कहते हैं।
मुनफ़रिद हो कोई ख़ुशबू तो असर करती है।।

मर के जीता है ये इंसां कभी सोचा ‘गुलशन’।
आती जाती  हुई  हर सांस ख़बर करती है।।

आईना ए गुलशन….58…गुलशन ख़ैराबादी

हर नफ़स खौ़फो ख़तर किसका है।
है  ख़ुदा  साथ तो डर  किसका है।।

ये भी सोचा है कभी ज़ालिम ने।
चूर  ज़ख़्मों से जिगर किसका है।।

दिल जो  है आज  तेरे  सीने  में।
ये तो पागल है मगर किसका है।।

दिल  में  रहते   हो   हमेशा   मेरे ।
तुम समझते हो ये घर किसका है।।

कब सितम गर ने ये सोचा है भला।
ज़द पे तलवार की सर किसका है।।

दाग़ का  दर्द का  या ग़ालिब  का।
मेरी ग़ज़लों पे असर किसका है।।

किसको ‘गुलशन’ ये बताएं जाकर।
दर्द  दिल  में  है  मगर  किसका है।।

आईना ए गुलशन…59….गुलशन ख़ैराबादी

अपने गुलशन कि मैं कैसे बाग़बानी छोड़ दूं।
फूल की ख़ुशबू  से कैसे शादमानी छोड़ दूं।।

हर किसी पर शफ़क़तें या मेहरबानी छोड़ दूं।
क्या बुजुर्गों की रवायत भी पुरानी छोड़ दूं ।।

दौलत ए दुनिया की सारी कामरानी छोड़ दूं।
तेरे ग़म मिल जाएं तो हर शादमानी  छोड़ दूं।।

ख़त्म कर दूं सारे किस्से इक कहानी छोड़ दूं।
मैं ग़ज़ल ऐसी लिखूं अपनी निशानी छोड़ दूं ।।

क्या करूं मैं  तेरी खा़तिर ऐ ग़रीबी  कुछ बता।
डर से महंगाई के क्या खेती किसानी छोड़ दूं।।

जब ख़ज़ां का दौर था तुमसे शिकायत कुछ न कि।
अब मैं गुलशन की  ये कैसे रुत  सुहानी छोड़ दूं ।।

अपने ‘गुलशन’ की हिफ़ाज़त मैं करूंगा उम्र भर।
बिजलियों के  खौ़फ़ से  क्या बाग़बानी छोड़ दूं।।

आईना ए गुलशन..60..गुलशन ख़ैराबादी

अहबाब के कुछ खास करम देख रहे हैं।
“दुनिया ए मोहब्बत में अलम देख रहे हैं”

तुझसे कोई शिकवा न ज़माने से शिकायत।
क़िस्मत में लिखा है वही हम देख रहे हैं।।

क्या इश्क़ का हासिल तो नहीं है ये रफी़को।
हर आंख  ग़म ए इश्क़ में   नम  देख रहे हैं।।

मंज़र है बिछड़ने का वही तुझसे मुक़ाबिल।
भीगी   हुई  आंखों  से  जो  हम देख रहे हैं।।

कुछ दिल में ख़लिश उनके भी होती है यकी़नन।
नज़रें  जो   उठा  कर  मुझे  कम  देख  रहे  हैं ।।

तन्हाई के सहरा में भटकते हैं जो हम आज।
महसूस  ये   होता  है  सनम   देख  रहे  हैं ।।

वो आज मुहाजिर हैं  लिए आंख  में  आंसू ।
‘गुलशन’ से बिछड़ने का जो ग़म देख रहे हैं।।

आईना ए गुलशन..61…गुलशन ख़ैराबादी

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