एक नेकी तो कमा लूं मैं भी। Ek neki to Kama Lun main bhi

“एक नेकी तो कमा लूं मैं भी”

कोई  रोता  है  हंसा लूं मैं भी।
“एक नेकी तो कमा लूं मैं भी”।।

दिल की ये बात न टालूं मैं भी।
आपको दिल में बसा लूं मैं भी।।

ऐ खुदा तू दे मुझे रिज़्क़े हलाल।
एक  भूखे को खिला लूं मैं भी।।

दे इजाज़त ये मुझे वक़्त  अगर।
उनको पलकों पे उठा  लूं मैं भी।।

आप ने मुझको बिठाया दिल में।
आप को दिल में बिठा लूं मैं भी।।

वो जो सोए हैं अभी ग़फ़लत में।
इक अज़ां दे के बुला लूं मैं भी।।

जब वो कहते हैं मुझे दुश्मन ए जां।
दोस्त  फिर  कैसे  बना  लूं  मैं  भी।।

अब तेरे  नाम की फ़िक्र ए गुलशन।
इक किताब और निका लूं  मैं  भी।।

दिल के काग़ज़ पे तेरी ऐ ‘गुलशन’।
एक   तस्वीर   बना  लूं   मैं  भी।।
  गुलशन  खै़राबादी

मैं पढ़ लेता हूं बिस्मिल्लाह हर इक काम से पहले।
नहीं  लेता  किसी  का  नाम  तेरे  नाम  से  पहले।।

मुझे  मालूम  है  बेचैन  होगी  मेरी  खा़तिर  मां।
मैं घर को लौट आता हूं  हमेशा शाम से पहले।।

उठेंगी उंगलियां मुझ पर तो इतना सोच लेना तुम।
“तुम्हारा  नाम भी  आए  गा  मेरे  नाम  से  पहले”।।

पढ़ा मिन्हां ख़ल्क़नाकुम सभी ने डाल दी मिट्टी।
लिटाया  दोस्तों  ने  क़ब्र  में  आराम  से  पहले।।

मुझे तो आज  भी  गुज़रे  हुए  दिन याद आते हैं।
वो मुझपर मेहरबां था गर्दिश ए अय्याम से पहले।।

हमारा  फ़र्ज़  है  बढ़ते  रहें  बढ़ते  रहें    पैहम।
जुनूं में सोचना क्या है दिल ए नाकाम से पहले।।

मुहब्बत में दिए हैं तूने मुझ को ग़म बहुत ‘गुलशन’।
लगा  लूंगा  गले  सारे  दिले  ना काम  से  पहले।।
             गुलशन खै़राबादी

दुश्मनी   से डर कैसा   दोस्ती से  डरते हैं ।
खाए हैं  फ़रेब इतने  हर खुशी से डरते हैं।।

जब से आशियां अपना जल गया गुलिस्तां में।
हो  कहीं  उजाला  हम  रोशनी  से   डरते  हैं।।

कुछ न कुछ तो होगा ही इसलिए जहां वाले।
आदमी  की  सूरत में   आदमी   से  डरते हैं।।

हम तो धूप के राही   साथ साथ  सूरज है।
जिस्म जिन के नाज़ुक हैं चांदनी से डरते हैं।।

मौसम ए बहाराँ ने दिल है मुत्मइन लेकिन।
हम ग़मों के मौसम की वापसी से डरते हैं।।

उंगलियां न  उठ जाएं तार-तार दामन पर।
शायद इसलिए ‘गुलशन’ बेखुदी से डरते हैं।।
#गुलशन #खैराबादी

मश्क़े सुख़न को जारी रखना।
“गुलशन” बात हमारी रखना।।

फूल  अगर  हैं  महकाने  तो।
गोड़ के अपनी क्यारी रखना।।

शोला सिफ़त हो लफ्ज़ तुम्हारे।
फ़िक्र  में   वो   चिंगारी  रखना।।

फ़न की क़ीमत यूँ न मिलेगी।
ग़ज़लों  को   मेंआरी  रखना।।

इल्म अगर हासिल करना है।
मेहनत  पैहम  जारी रखना।।

हम तो हैं बीमार ग़ज़ल के।
तुम  भी  ये बीमारी रखना।।

जाने कब आ जाए बुलावा।
चलने  की  तैय्यारी  रखना।।

उर्दू  की  तो  शान  है ‘गुलशन’।
ख़ुशबू  प्यारी-प्यारी  रखना।।
#गुलशन #ख़ैराबादी

टूट  रहा  है अंग-अंग  पुरवाई है।
ऐसे में फिर याद तुम्हारी आई है।।

झील सी तेरी आंखों में गहराई है।
और बहुत ये मौसम भी हरजाई है।।

उर्दू सब के ज़हनो दिल पर छाई है।
इसने  लोगों  की‌ तौक़ीर  बढ़ाई है।।

लोग जिसे संगीत का जादू कहते हैं।
उर्दू  की  ग़ज़लों  में  वो शहनाई  है।।

सूना  सूना घर आंगन है बिन तेरे।
सूनी-सूनी लगती  हर  शहनाई  है।।

जो  अपने  थे वो  लगते  हैं गैर हमें।
वक्त़ पड़ा तो बात समझ में आई है।।

सब्रो  क़रार उसी ने लूटा  है  मेरा।
नाम अगर लेता हूं तो रुसवाई है।।

रौन्द रहा  है  पैरों से  तस्वीर मेरी।
मेरा दुश्मन आज मेरा ही भाई है।।

मैं रोया तो भीग गया मां का आंचल।
ममता  में  देखो  कितनी  गहराई  है।।

शफ़्क़तऔर मोहब्बत अपना हैै शेवा।
राह  यही  अब   गैरों  ने  अपनाई  है।।

शेर कहो तुम सोच समझकर ऐ ‘गुलशन’।
पहले  देखो  बात  में  कुछ  गहराई   है।।
#गुलशन#ख़ै़राबादी

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