हम चुका सकते नहीं क़ीमत तेरे एहसान की ham chuka sakte nahin kemat tere ahsaan ki


अपनी  अपनी फ़िक्र में  बेदार हैं।
हम सभी इस दौर के फ़न्कार हैं।।

क्यों न हो सब पर इनायत की नज़र।
रहमत ए  कुल  जब  मेरे सरकार हैं।।

क्या  गुलों से उड़ गई  सारी महक।
तितलियां क्यों आजकल बेज़ार हैं।।

ख़ुश नज़र आए यहां कोई तो क्यों।
सब  के  शानों पर  ग़मों  के बार हैं।।

फ़र्ज़ है कोई अमल अच्छा करो।
ज़िन्दगी के दिन यही दो चार हैं।।

हमसे कहते हैं ज़माना छोड़ दो।
ज़िन्दगी  में  कैसे-कैसे  यार  हैं।।

सब बजा कहते हैं जब ‘गुलशन’ तो फिर।
आप   क्यों   इस   बात   से   बेज़ार   हैं।।

  आईना ए गुलशन 129 गुलशन ख़ैराबादी

झूठी क़समें खा रहे हैं आप क्यों भगवान की।
क्या  बदल पाएंगे सूरत  है जो हिंदुस्तान की।।

वो बड़ा ही रहम वाला है तो कर देगा मुआफ़।
हां ख़ता पर हो निदामत भी किसी इंसान की।।

क्या  डरेगा  ग़र्दिश ए अय्याम से दुनिया में वो।
दिल में हों महफ़ूज़ जिसके आयतें कुरान की।।

ये  है  महबूब ए इलाही  की  हिदायत  का असर।
अब बदल सकती नहीं सूरत किसी फ़रमान की।।

ज़र्फ़  ए  इंसानी  यही  कहता है हमसे दोस्तो!
दर गुज़र कर दें अगर कुछ बात हो नादान की।।

ऐ मेरे हमदम मेरे मुश्फ़िक़ मेरे रहबर अज़ीज़।
“हम चुका सकते नहीं क़ीमत तेरे एहसान की”

बाब ए हक़ से जोड़ लें आईना ए एहसास को।
फिर बदल जाएंगी ‘गुलशन’ सीरतेंं इंसान की।।

आईना ए गुलशन 131 गुलशन ख़ैराबादी

इश्क़ जिस रोज़ हद से गुज़र जाएगा।
दिल वो अपना मेरे नाम कर जाएगा।।

आलम ए हुस्न ख़ुद ही निखर जाएगा।
जब  मुक़द्दर  हमारा  संवर   जाएगा।।

अपने मरकज़ को छोड़ेगा जो भी बशर।
ख़ुश्क  पत्तों  की  सूरत  बिखर जाएगा।।

वो  अगर  आ गया जानिब ए मयकदा।
होश  में  फिर  कहां लौट कर जाएगा।।

अजनबी    शहर   में   ढूंढता   है   किसे।
कुछ तो मुझको बता किसके घर जाएगा।।

एक   क़तरा   न ‌ पाएगा   ये   सोच   ले।
तू समन्दर  की  जानिब  अगर जाएगा।।

हर्फ़  आएगा   वादे   पे   ‘गुलशन’   तेरे।
बात  से  जो   तू  अपनी मुकर जाएगा।।

आईना ए गुलशन 133 गुलशन ख़ैराबादी

ज़िन्दगानी की रह गुज़र महके ।
तुम चलो साथ तो सफ़र महके।।

ख़ुश्बूओं  में  सबा   नहाई   है।
सुब्ह दम आज मेरा घर महके।।

आज उसके गुलाबी चेहरे को।
छू के आई है तो नज़र महके।।

फ़सले गुल की तरह तेरी दुनिया।
ये  दुआ है कि  उम्र  भर  महके।।

बेटियां  हैं  तो अपनी क़िस्मत से।
उनके  होने  से  सारा घर महके।।

हक़ बयानी के फूल खिल जाएं।
काश   आईना  ए   हुनर महके।।

इस  तरह  कुछ   बहार  आई   है।
‘गुलशन’ए जां का हर शजर महके।

आईना ए गुलशन 135 गुलशन ख़ैराबादी

बहुत   ख़ुलस   से जो लोग मिलने आए थे।
हम उनको और वो हम को गले लगाए थे।।

अजीब वक़्त के तायर थे दिन भी बचपन के।
वो  जिन  के  साथ  हंसे  खेले  मुस्कुराए  थे।।

बिखर  गए  वो सभी ख़ुश्क पत्तियों की तरह।
जो अपने मरकज़ ए हस्ती को छोड़ आए थे।।

छिपे थे ऐब अंधेरे में हर किसी के मगर।
जला चराग़  तो सब रोशनी में आए थे।।

किसी का बस न चला बन्दा ए ख़ुदा पे कभी।
तमाम    ज़ोर    हरीफ़ों    ने  आज़माए  थे।।

दयार ए ग़ैर  में ये सानिहा  भी ख़ूब  रहा।
“हमें जो दे  गए  मिट्टी   वो सब   पराए थे”

अदब नवाज़ थे हैरत में इस लिए ‘गुलशन’।
सुख़नवरी में जो हम फिर से लौट आए थे।।

आईना ए गुलशन 137 गुलशन ख़ैराबादी

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