ख़त्म हो जाता है जीने का तमाशा कैसे khatm Ho jata hai jeene ka Tamasha kaise


ज़माने  के  मुताबिक़   ढ़ल  रहा हूं।
मैं अपनी रह गुज़र पर चल रहा हूं।।

न  पूछो  मुझसे वो दौर ए तबाही।
जहां बीता हुआ इक पल रहा हूं।।

जो खोया है उसे पाना है मुश्क़िल।
अबस हाथों को अपने मल रहा हूं।।

मुझे   बूढ़ा   कहेंगे   मेरे   बच्चे।
मैं जिन के वास्ते पागल रहा हूं।।

नई तहजी़ब का मुझपर असर क्या।
वही  हूं  आज मैं  जो  कल  रहा हूं।।

गुनहगारों ने  मुझ  में ज़हर घोला।
कभी शफ़्फा़फ़ गंगा जल रहा हूं।।

मुझे  सब  चाहते हैं यूं भी ‘गुलशन’।
ग़ज़ल की बज़्म में हर पल रहा हूं।।

आईना ए गुलशन 101 गुलशन ख़ैराबादी

ज़िन्दगी जब तेरी उल्फ़त में गिरफ़्तार न थी।
ख़्वाब ए गफ़लत में थी हस्ती मेरी बेदार न थी।।

गहमा-गहमी तो कहीं भी सर ए बाज़ार न थी।
क्या था जो हुस्न की दुनिया ही ख़रीदार न थी।।

यूं  तो  मैं  भी  रहा यूसूफ़  के  ख़रीदारों में।
हां मगर  हाथ  में  वो कूव्वते दीनार न थी।।

शोर तो आम था इक हादसा ए जां का मगर।
सुर्ख़ियों में जो ख़बर थी सर ए अख़बार न थी।।

मैं  बुजुर्गों  की  दुआओं से ही महफूज़ रहा।
ये  अलग  बात  मेरे  हाथ में तलवार न थी।।

बस हवादिस ही हवादिस थे सितम ढ़ाने को।
सारी   बस्ती   थी  तमाशाई  मददगार न थी।।

देख ‘गुलशन’ की फ़की़री का भरम रखने को।
वा  दर ए  दिल था कोई दरमियां दीवार न थी।।

आईना ए गुलशन   102    गुलशन ख़ैराबादी

वो  देखो मेरा  हमदम आ गया है।
मेरे ज़ख्मों का मरहम आ गया है।।

ब हर सू  रक़्स ए गुल है और मैं हूं ।
“ग़ज़ल कहने का मौसम आ गया है”

तबीब ए वक्त़ की हाजत नहीं अब।
मेरे घर आब ए ज़मज़म आ गया है।।

न जाने कौन गुज़रा है फ़लक से।
तहय्यूर में हर आलम आ गया है।।

ख़मीदा  हो रहे हैं तेग़ ओ  ख़ंजर।
क़लम में आज वो दम आ गया है।।

हुआ है कौन घर से आज रुख़सत।
जो खुशहाली में भी ग़म आ गया है।।

संवरता जा रहा है दिल का ‘गुलशन’।
ख़यालों में जो हमदम आ गया है।।

आईना ए गुलशन  103   गुलशन ख़ैराबादी

“ज़मीं  से  अपने  शाने  लग गए हैं”
समझ लो हम ठिकाने लग गए हैं।।

हमारी  दास्तां  को  सुनते सुनते।
सभी  आंसू  बहाने  लग  गए हैं।।

अधूरी ही रही अब तक  तमन्ना।
ग़ज़ल कहते ज़माने लग गए हैं।।

जो ख़ुद को आईना कहते थे देखो।
वही  सच  को  छुपाने  लग गए हैं।।

हुआ क्या जो थे मेरी जां के दुश्मन।
वो  बन कर  दोस्त आने लग गए हैं।।

वो हर दम चीख़ते हैं छत के ऊपर।
कबूतर  जो   उड़ाने   लग  गए  हैं।।

उन्हें समझूं न क्यों मैं अपना ‘गुलशन’।
वो   मेरा  ग़म   उठाने   लग   गए  हैं।।

आईना ए गुलशन   104    गुलशन ख़ैराबादी

बहर ए  बे फ़ैज़  के  नज़दीक मैं  जाता कैसे।
ख़ुद वो  प्यासा था मेरी प्यास बुझाता कैसे।।

दिल जो पत्थर नहीं तो फिर ये तमाशा कैसे।
आंख  ने  छोड़  दिया  अश्क  बहाना  कैसे।।

चांद  के  रुख़ से उठा होगा यक़ीनन  पर्दा।
वरना इस  रात  में  फैला  है उजाला कैसे।।

मैं तो ख़ामोश रहा अर्ज़ ए तमन्ना भी न की।
खुल गया  राज़  मेरे  दिल का खुदाया कैसे।।

कौन सी  ज़र्ब  लगी शीशा ए  दिल  पर  तेरे।
अश्क जुगनू की तरह आंख में चमका कैसे।।

कौन सी आ गई मंज़िल तेरी मायूसी की।
जान   देने  का  किया  तूने  इरादा  कैसे।।

सोचना बैठके  फ़ुर्सत में कभी ऐ ‘गुलशन’।
“ख़त्म हो जाता है जीने  का  तमाशा कैसे”

आईना ए गुलशन  105  गुलशन ख़ैराबादी

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