लाख सज़्दे किया करे कोई। Lakh Sajde Kiya Kare koi


कोई अपना हो ये ख़्वाहिश बहुत है।
हमारे   दिल  में   गुंजाइश  बहुत है।।

सुना  है  आदमी  पत्थर  हुआ  है।
पस ए पर्दा यही साज़िश बहुत है।।

खन्डर  होने लगे कच्चे  मकां  सब।
कि सैल ए आब है बारिश बहुत है।।

ग़रीबी  में  कोई  रिश्ता  हो  कैसे।
नए लोगों की फ़रमाइश बहुत है।।

न  क्यों  तालीम  दूं  बेटी  को अपनी।
मोअल्लिम हों मेरी कोशिश बहुत है।।

बनाऊं ज़ीस्त को बेहतर से बेहतर।
ब हर लम्हा मेरी काविश बहुत है।।

तुझे  ‘गुलशन’  ख़ुदा  से  मांग  लूंगा।
मिले तो फिर मेरी ख़्वाहिश बहुत है।।

आईना ए गुलशन 111 गुलशन ख़ैराबादी

क़ैस  का हक़ अदा करे कोई ।
इश्क़  की  इन्तेहा  करे  कोई।।

यूं मोहब्बत किया करे कोई।
दर्द मुझको दिया करे कोई।।

ज़ख्म़  कितने  हैं  ज़िन्दगानी में।
किसकी किसकी दवा करे कोई।।

ये गुलामों की ज़िन्दगी आख़िर।
सोच कब तक जिया करे कोई।।

सिर्फ़ कहने  को ही नहीं इंसान।
हक़ भी उसका अदा करे कोई।।

बन्दगी कुछ नहीं बग़ैर  ख़ुलूस।
लाख  सज़्दे  किया  करे  कोई।।

जुज़ तेरे कौन है जो ‘गुलशन’ में।
एक   पत्ता    हरा    करे   कोई।।

आईना ए गुलशन 112 गुलशन ख़ैराबादी

दिल  में  थे  दर्द ए जिगर में हम थे।
हर  तरफ़  उसकी  नज़र में हम थे।।

ग़ैर मुमकिन था उभरना  आख़िर।
उनकी आंखों के भंवर में हम थे।।

देख  पाए  न  फ़जा़  दुनिया  की।
जाने किस क़ैद के घर में हम थे।।

कौन पहचानता हमको आख़िर।
एक  अन्जान  नगर  में  हम  थे।।

ख़ौफ़ किस बात का होता हमको।
क्यों कि अल्लाह के घर में हम थे।।

जान कर यूं न मिला वो हमसे।
बेवफ़ा उसकी नज़र में हम थे।।

तुम  कहां   ढूंढ   रहे  थे ‘गुलशन’।
हर नफ़स दिल के नगर में हम थे।।

आईना ए गुलशन 113 गुलशन ख़ैराबादी

शेर  कहता  हूं  ब नाम ए ज़िन्दगी।
ताकि बन जाए पयाम ए ज़िन्दगी।।

चेहरे चेहरे पर लिखा था साफ़-साफ़।
पढ़  लिया  हमने  कलाम ए ज़िन्दगी।।

मौत आ जाती है  बिना  दस्तक दिए।
क्या अजब  है  ये निजा़म ए ज़िन्दगी।।

दोनों    आलम  में     रहेगा    सुर्ख़ुरू।
पा के हक़  पर अहतमाम ए ज़िन्दगी।।

अपने मां ओर बाप की ख़िदमत करो।
पाओगे  जन्नत  मक़ाम  ए   ज़िन्दगी।।

जिसका ग़लबा है मेरी हर सांस पर।
ये  उसी  का  है  गुलाम ए  ज़िन्दगी।।

देखते  ही   देखते    दिन   कट   गए।
आ गई आख़िर को शाम ए ज़िन्दगी।।

आईना ए गुलशन 114 गुलशन ख़ैराबादी

ख़ुदा  के  हुक्म  से  अनजान है वो।
जभी  तो  बे सर ओ सामान है वो।।

यक़ीनन  साहिब  ए  ईमान  है वो।
ख़ुदा   का  शुक्र  है  इंसान  है वो।।

लिए  था  हर  घड़ी उर्दू का जज़्बा।
वो सर  था और सैय्यद खान है वो।।

ख़ल्ल डाले  हुए  है  ज़हनो दिल पर।
जिसे   टी.वी.   कहें   शैतान  है वो।।

ख़लिश  मिटती नहीं है उसके दिल की।
सुना  है   साहिब   ए  दीवान   है   वो।।

बराबर    उसका   चेहरा  पढ़  रहा  हूं।
समझता   कुछ   नहीं   नादान   है  वो।।

पढ़ो   तो  ग़ौर  से  ‘गुलशन’  उसे  तुम।
हक़ीक़त ‌ में   बहुत   आसान   है  वो।।

आईना ए गुलशन 115 गुलशन ख़ैराबादी

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