मौसम है अपने शहर का कश्मीर की तरह Mausam hai Apne Shahar ka Kashmir ki tarah

बज़्म  में  कौन आने वाला है।
जिस तरफ देखिए उजाला है।।

जब भी दिल से तुम्हें निकाला है।
दर्द  दुनिया  का  हम ने पाला है।।

भूल बैठा हूं सारी दुनिया को।
कैसा जादू ये तुम ने डाला है।।

जो भी चाहो वो मांग लो रब से।
हर बशर को वो देने वाला है।।

उसके  आंचल  में  नींद  आएगी।
उम्र भर जिसने मुझको पाला है।।

पूजते  हैं  उसे   अकी़दत  से।
खा़न ए दिल में जो शिवाला है।।

बस उसीकी अता है ‘गुलशन’ पर।
जो  बड़ा  रहम  करने  वाला  है।।

आईना ए गुलशन..51..गुलशन ख़ैराबादी

शोरे दरिया जहां पे भारी है।
हमने  क़श्ती वहीं उतारी है।।

दिल में रहकर नज़र चुराते हो।
हमसे ये कैसी परदा दारी है।।

क्यों गुरेजां  हैं  मेहरबां हमसे।
हो न हो  कुछ ख़ता हमारी है।।

जब भी ठोकर लगी ज़माने की।
फ़िक्र  ने  ज़िन्दगी  संवारी  है।।

जानते  हैं  कि  बेवफा़  है  मगर।
ज़िन्दगी फिर भी सबको प्यारी है।।

एक आलम में देखता हूं जिधर।
“सब पे  उसकी  इजारा  दारी है”

कोई समझा न आज तक ‘गुलशन’।
मेरे   दिल   में   जो   बेक़रारी  है।।

आईना ए गुलशन..52…गुलशन ख़ैराबादी

कहता है जब  भी  शेर  कोई मीर की तरह।
लगता है मुझको नाला ए शबगीर की तरह।।

अल्लाह दे वो चश्मे बशारत  कि  पढ़ सकूं।
लहरों पे कुछ लिखा तो है तहरीर की तरह।।

किससे करूं मैं शिकवा ए तक़दीर क्या करूं।
पेचां  है  तेरी  जुल्फ़  गिरह गीर  की तरह ।।

तुमने भी फेर ली है नज़र  देखने  के  बाद।
चुभती है दिल में बात यही तीर की तरह।।

लगने लगी है बार सी अब ज़िन्दगी मुझे।
ग़ुर्बत  पड़ी  है पांव में जंजीर की तरह।।

उड़ने  लगी  है बर्फ़  फ़जा़ओं में  हर  तरफ़।
“मौसम है अपने शहर का कश्मीर की तरह”

‘गुलशन’ ज़रूर होगी बुराई जहां से कम।
इंसाफ़  हो  उमर  या  जहांगीर की तरह।।

आईना ए गुलशन…53…गुलशन ख़ैराबादी

इक सितारा फ़लक से जुदा हो गया।
लोग  समझे  कोई  हादसा हो गया।।

कोई अपना जो मिलकर जुदा हो गया।
दर्द ए  दिल  और  मेरा  शिवा  हो गया।।

उस निगाहे सदाक़त का ऐसा असर।
“एक  पत्थर  था जो आईना हो गया”

तेरी  चश्मे  इनायत  के फ़ैजा़न से।
मेरे जीने का इक आसरा हो गया।।

शहर का आज मौसम भी ग़मगीन है।
ऐसा लगता है फिर सानेहा हो गया।।

ऐ खुदा किस की आख़िर नज़र लग गई।
मेरी सोने की चिड़िया को क्या हो गया।।

अब शिकायत किसी से न शिकवा कोई।
मेरी  किस्मत में था जो लिखा  हो गया ।।

हर तरफ आज ‘गुलशन’ है चर्चा तेरा।
एक वादा था  मुझसे  वफ़ा हो गया।।

आईना ए गुलशन..54.55..गुलशन ख़ैराबादी

थे शम्मे वफ़ा की तरह जलते जलते।
हुए ख़ाक आख़िर पिघलते पिघलते ।।

तुम्हारे नहीं है तो फिर किस के ग़म हैं ।
जो देते हैं मुझको खुशी चलते चलते ।।

कहां जाऊं अब मैंकदे से मैं उठकर।
“बहल जाएगा दिल बहलते बहलते”

बहुत मेरे अरमान निकले हैं फिर भी।
बहुत रह गए हैं निकलते निकलते।।

वो जिसने न की वक्त़ की कद्र लोगो।
वही रह गया हाथ को मलते मलते।।

ये  सांसें  ठहर  जाएंगी  देखना  जब।
निकल जाएगा दम निकलते निकलते।।

ख्यालों में थी जिसकी तस्वीर ‘गुलशन’।
मुझे मिल गया राह में चलते चलते।।

आईना ए गुलशन..56…गुलशन ख़ैराबादी

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