मेरी आंखें देखती हैं रोज़ इक मंज़र नया meri Aankhen dekhti Hain roj ek Manzar naya

मेरे  मौला  तू  ये  करम  कर दे।
सहने गुलशन में ताज़गी भर दे।।

मैं भी उड़ता फिरूं बुलंदी पर।
हौसलों का मुझे तू शहपर दे।।

मीरो ग़ालिब का दर्द दे मुझको।
मेरी ग़ज़लों को मोतबर कर दे।।

मैं जलाऊंगा हक़ की राहों में।
तू चिरागों  में  रौशनी भर दे।।

बेटियां पढ़के सबकी आलिम हों।
ऐ  ख़ुदा  रौशनी  ये  घर-घर दे।।

जिसमें नायाब हो सभी गौहर।
मुझको वो फ़िक्र का समन्दर दे।।

आज उर्दू पढ़ें सभी ‘गुलशन’ ।
ऐसी तौफ़ीक तू अता कर दे।।

आईना ए गुलशन..62…गुलशन ख़ैराबादी

सुकून  देता  है  गुलशन क़रार देता है।
ख़जां के बाद वो फ़सले बहार देता है।।

कहां है बस में किसी के ये कारोबारे हयात।
सभी  को  रिज़क़  तो  परवरदिगार देता है।।

उसे जगह नहीं मिलती किसी की आंखों में।
नज़र  से  जब  वो  किसी  को  उतार देता है।।

फ़कीरे शहर की फ़ितरत में क्या हुआ दाख़िल।
“जो  दिन  को  रात  बना  कर  गुज़ार  देता है”

जिसे लगाव है ख़ाके  वतन के ज़र्रो से।
वतन के वास्ते वो जां भी  वार देता है।।

हंसी भी खूब है बच्चों की घर के आंगन में।
तकान   सदियों  की  पल  में  उतार देता है।।

ये उसकी मर्ज़ी है राहे हयात में ‘गुलशन’।
किसी को फूल किसी को  वो खा़र देता है।।

आईना ए गुलशन..63…गुलशन ख़ैराबादी

फूलों भरा गुलशन है ख़ुशबू भी सुहानी है।
चंपा है चमेली है क्या रात की रानी है ।।

ठहरेगा कहां जिसकी फितरत में रवानी है।
“खुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है”

घटता है न बढ़ता है ये दर्द मेरे दिल का।
महबूब की ये मेरे क्या खूब निशानी है ।।

मिलने को तड़पती है दिन-रात समंदर से।
रोके से रुके है कब दरिया की रवानी है।।

पगली है जो लेती है वो नाम तेरा हरदम।
इक तू भी  दीवाना है इक वो भी दीवानी है।।

इक झूठ की खा़तिर वो सौ झूठ कहे शायद।
सच  बोलने  वाल  के  लफ़्ज़ों  में  रवानी है।।

अल्लाह इनायत की ‘गुलशन’ पे नज़र रखना।
पुरखों की विरासत है बस साख  बचानी है।।

आईना ए गुलशन…64..गुलशन ख़ैराबादी

जशन तो हम भी मनाएंगे कभी मिलकर नया।
जब बना लेंगे तुम्हारे दिल में अपना घर नया।।

वो   निगाहे  लुत्फ़  से   बातें   करेगा   उम्र   भर ।
जो मिला है मुझको क़िस्मत से लिखा दिलबर नया।।

हर  किसी के वास्ते थे जामो  मीना क्या कहूं।
मुझको साक़ी से मिला है दर्द का साग़र नया।।

नींद  आती  है तो  सो  लेते हैं फ़र्शे खा़क पर।
हम  ग़रीबों  के लिए होता है कब बिस्तर नया।

बोझ   ढ़ोती  है   ग़रीबी  भीक  मांगे  हैं  कहीं।
“मेरी  आंखें  देखती  हैं  रोज़  इक  मंज़र नया”

सर  पे  पगड़ी  केश  कंघी  ओर कड़ा पहचान है।
आज भी रखते हैं सिख ही म्यान में खंजर नया।।

जैसे उभरे मीर ओ ग़ालिब  वैसे उभरे हैं अज़ीज़।
सब यही कहते हैं ‘गुलशन’ को मिला रहबर नया।।

आईना ए गुलशन..65…गुलशन ख़ैराबादी

जिसके सीने में है  एहसास  बशर  जैसा है।
और जिस दिल में ना हो दर्द हजर जैसा है।।

याद आते ही तेरी बढ़ती है सोज़िश कितनी।
“दिल का हर ज़ख़्म मेरे दोस्त शरर जैसा है”

आईना  आया  मुक़ाबिल  जो  मेरे  चेहरे के ।
कुछ कमी है मेरे अन्दर कि जो डर जैसा है।।

फेंक  कर  देख लो पानी में  कोई भी कंकर।
उसकी  लहरों  में  उभरने  का हुनर  जैसा है।।

मां की और बाप की अज़मत है हमारे दिल में।
हम पे उनकी  ही  दुआओं का असर  जैसा है।।

वो तो उतरा था समन्दर में इस उम्मीद के साथ।
तह  से  जो  हाथ  में  लाया वो  गुहर  जैसा है।।

आके  देखे  तो  कोई मेरी  लहद पर ‘गुलशन’।
मुझको आराम  यहां  आज  भी  घर  जैसा है।।

आईना ए गुलशन…66….गुलशन ख़ैराबादी

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