पत्थरों का रूख़ ए हस्ती पे गुमां होता है।


पत्थरों  का  रूख़ ए हस्ती पे गुमां होता है।
जब कोई शोला ए एहसास धुआं होता है।।

जिसको इस राह में एहसास ज़ियां होता है।
जज़्बा ए  इश्क़ वो  मक़बूल  कहां होता है।।

ख़ून ए मज़लूम जो होता है ज़मीं पर कोई।
मुझसे हस्सास की आंखों से रवां होता है।।

आदमी गर्दिश ए हालात से घबराए क्यों।
चांद तारों में भी गर्दिश का समां होता है।।

आंसुओं में कभी चेहरे की उदासी में कभी।
दर्द जब हद से गुज़रता है अयां होता है।।

ये समझ लो कि सितम हद से बढ़ा है कोई।
ख़ून ए दिल क्या यूं ही आंखों से रवां होता है।।

आईना ए गुलशन 30  गुलशन ख़ैराबादी

Urdu Ghazal | Romantic Urdu Love Shayari

कूबकू शौक़  लिए फिरता है मुझको गुलशन।
देखना   है   तेरा    दीदार   कहां  होता है।। 

शीशा   ए   दिल में मय शौक़ भरी रहने दे।
हालते दिल जो मेरी कल थी वही रहने दे।।

मेरी आंखों में ये दानिश्ता नमी रहने दे।
शामे उम्मीद सितारों से सजी रहने दे।।

मेरी क़िस्मत की लकीरों में जुदाई है अभी।
मुझको अपने से यूं ही दूर अभी रहने दे।।

रौनके़ सहने गुलिस्ता को बढ़ाने के लिए।
तोड़ मत शाख़ से नाजुक सी कली रहने दे।।

जाने किस वक़्त जुदाई की घड़ी आ जाए।
अपनी तस्वीर निगाहों में बसी रहने दे।।

मैं की मुजरिम हूं तेरा और वफा़दार भी हूं।
दे सज़ा मुझको कभी और कभी रहने दे।।

मुस्तक कुछ तो रहूं तेरे करम का मैं भी।
मेरी कश्ती यूं ही तूफ़ान में पड़ी रहने दे।।

जिस से रोशन है मेरी बज़्में तसव्वुर गुलशन।
दिल में यादों की वही शम्मा जली रहने दे।।

आईना ए गुलशन 31  गुलशन ख़ैराबादी

सितम को मैं सितम कहता रहा हूं ।
जुबां को इसलिए कटवा रहा हूं।।

हिलाल ए ईद की मानिंद हूं मैं ।
बड़ी हसरत से देखा जा रहा हूं।।

मैं मुफ़्लिस का दिया टूटा हूं लेकिन ।
ब हर  सू रोशनी फ़ैला रहा हूं।।

खुदा जाने वो अब लौटेगा न लौटे।
मैं पै हम मुंतज़िर उनका रहा हूं ।।

वो जिस से फ़ैज़ मिलता है जहां को।
उसी का मैं भी नक्शे  पा रहा हूं।।

मैं शायर हूं ज़माने की नज़र में ।
मैं आशिक़ आज तक तेरा रहा हूं।।

तुम्हीं तो जान व दिल ईमां हो गुलशन ।
कहां मैं दूर तुमसे जा रहा हूं।।
      

आईना ए गुलशन 33   गुलशन ख़ैराबादी

हमेशा तीरगी पर छा रहा हूं।
मैं बनकर शम्मा जलता जा रहा हूं।।

मैं खुशबू में बसा हूं फूल ऐसा।
सभी के ज़हनों दिल महका रहा हूं।

तख़य्यूल में है जो तस्वीर तेरी।
उसी से अपना दिल बहला रहा हूं।।

मेरे दिल से वो अब तक खेलते हैं।
खिलौना आज भी उनका रहा हूं।।

न खेला कर मेरे दिल से खुदारा।
ज़माने से तो मैं  तेरा रहा हूं ।।

तड़पता था मैं तुमसे दूर रहकर।
करीब आकर बहुत पछता रहा हूं ।।

कभी गुलशन ने जो आंखों से देखा।
वही मंजर तुम्हें दिखला रहा हूं।।

    

आईना ए गुलशन 34  गुलशन ख़ैराबादी

कभी अपनों से हम कोई रियाकारी नहीं करते।
कोई दुश्मन भी अपना हो तो गद्दारी नहीं करते।।

वही कहते हैं मुंह पर जो भी अपने दिल में होता है।
ग़रज़ अपना कोई भी हो  तरफ दारी नहीं करते।।

खुदा के रूबरू होना है इसकी फ़िक्र हो सबको।
क्यों अपनी मौत की पहले से तैयारी नहीं करते।।

तुम्हारे दरमियां हो या हमारे दरमियां कोई ।
छुपा लेते हैं कुछ बातें कि हम सारी नहीं करते।।

करेला जानते हैं सब कि है तासीर में कड़वा ।
अगर ये नीम चढ़ जाए तो फिर यारी नहीं करते।।

कभी जो फ़िक्र से कहते हैं कोई शेर हम अपना।
वही पढ़ते हैं महफ़िल में अदाकारी नहीं करते।।

  बुलाए प्यार से कोई तो उसका दिल भी रखते हैं।
किसी भी शख़्स की गुलशन दिला जारी नहीं करते।।

     

आईना ए गुलशन 35  गुलशन ख़ैराबादी

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