सबसे प्यारा ये हमारा अपना हिंदुस्तान है Sabse pyara yah hamara apna Hindustan hai


ये हिमाला सबसे ऊंचा हिंद की इक शान है।
सबसे  प्यारा  ये  हमारा अपना हिंदुस्तान है।।

मालो दौलत पर है नाज़ां तू भी क्या नादान है।
चन्द  रोज़ा  ज़िन्दगी  का  ये  सरो  सामान है।।

सबको अपनी ही पड़ी है दूसरों की फ़िक्र क्या।
“ये  हमारे  वक्त़  की  सबसे  बड़ी  पहचान  है”

पैकरे  खुलको वफ़ा है दैरो  का़बा से अलग।
वो तो हिंदू है न मुस्लिम सिर्फ़ इक इंसान है।।

फिर हवा ख़ामोश है शानों पे कोई बोझ सा।
उठने वाला फिर समन्दर में कोई तूफ़ान है।।

जिसके चेहरे की तरफ़ देखो तो लगता है यही।
हर बशर क्या जानिए क्यों आज कल हैरान है।।

फ़सले गुल भी आएगी कुछ सब्र कर ‘गुलशन’ ज़रा।
ये  ख़जां  का  दौर  तो  कुछ  रोज़ का मेहमान है।।

  आईना ए गुलशन..76…गुलशन ख़ैराबादी

शजर हैं कौन जो वक़्फे़  ख़जां नहीं रहते।
हमेशा प्यार के  मौसम  जवां  नहीं रहते।।

हदे  निगाह  में  है बस सराब और सराब।
“सुलगती  रेत  पे  दरिया  रवा  नहीं  रहते”

कभी जो दिल में मेरी याद बन के रहते थे।
हैं मुझसे दूर तो अब  हमजबां नहीं रहते।।

बड़े  जतन  से  संवारे गए सभी  तिनके।
बिख़र गए  तो  वही आशिया नहीं रहते।।

वो जिन की सांसो पे अब बोझ लगने लगता है।
जहां  जहां  हो  धुआं   वो   वहां  नहीं  रहते।।

जहां में आज भी सच का ही बोल बाला है।
कहीं भी  झूठ  के रोशन  निशा  नहीं  रहते।।

ये और बात है ‘गुलशन’ को आरज़ू न रहे।
हसीन  लोग  जहां  में  कहां  नहीं   रहते।।

आईना ए गुलशन..77…गुलशन ख़ैराबादी

क़ुदरत ए किर दिगार का मंज़र।
फूल के  साथ  ख़ार  का मंज़र।।

बंद  आंखों  से  हमने देखा है।
शाने परवरदिगार  का  मंज़र।।

सबके  चेहरे  पे  छा  गई  रौनक।
जब छिड़ा ज़िक़्र ए यार का मंज़र।।

किसको फुर्सत जो आज कल देखे।
दामन   ए   तार   तार   का  मंज़र।।

दिल  से जब बोलना  उसे चाहा।
आ  गया  याद  प्यार  का मंज़र।।

जब अनल हक़ की बात होती है।
याद   आता  है   दार  का मंज़र।।

उसकी रहमत से सहने ‘गुलशन’ में।
हर   तरफ़  है   बहार  का   मंज़र।।

आईना ए गुलशन..78…गुलशन ख़ैराबादी

रहे  हक़ से जो  भटका है  उसे रहबर न लिखेंगे।
किआईने को हम अहले क़लम पत्थर न लिखेंगे।।

कोई कुछ भी कहे इससे ग़रज़ हमको नहीं लोगो।
जो  पानी  ही  नहीं  रखता  उसे गौहर न लिखेंगे।।

टपकता  है  लहू  जिस के  क़लम  से  बेगुनाहों  का।
हम उस मुंसिफ़ को अब इंसाफ़ का पैकर न लिखेंगे।।

तू हमको आज़माती है तो क्या ऐ गर्दिश ए दौरा।
तू गर्दिश है तुझे भूलने से हम महशर न लिखेंगे।।

हमें मालूम है रौशन कहां हैं शहर में गलियां।
अंधेरे घर को यारो ख़ान ए अनवर न लिखेंगे।।

मोहम्मद गोरी ओ महमूद को जो चाहो तुम लिखो।
ब्राहीमी है जो  उसको  कभी  आज़र  न लिखेंगे।।

बुलन्दी पर जो उड़ता है वो है अपनी निगाहों में।
ज़मीने आशियां जो  है  उसे  शहपर  न लिखेंगे।।

कहां वहदत है ऐ ‘गुलशन’ कहां इक शिर्क की मंजिल।
जो  मस्जिद  है  उसे  लोगों  कभी  मंदर  न लिखेंगे।।

आईना ए गुलशन.79….गुलशन ख़ैराबादी

कोई हमदम लगे जब अपनी उम्मीदों से प्यारा कम।
तो फिर घर के चरागों में भी लगता है उजाला कम।।

न  हो  जाए  कहीं  राजे़  मोहब्बत  फा़श दोनों  का।
नज़र से इसलिए मुझको भी उसने आज देखा कम।।

खुदा ने लिख दिया जितना भी चाहा मेरी क़िस्मत में।
मगर कितना है क्या है कुछ हुआ इसका खुलासा कम

उठे हैं जब से सर अहले जफा़ के सारे आलम में।
मोहब्बत करने वालों का हुआ है बोल बाला कम।।

बुढ़ापे  में  छिनी लाठी कि टूटा दिल पे कोहे ग़म।
तभी तो देखता हूं अपनी आंखों में उजाला कम।।

जो मेरा दोस्त था वो भी है मेरी जान का दुश्मन।
इसी बायस हुआ है मेरे जीने  का  सहारा कम।।

वही खाते हैं धोका ज़िन्दगी में आज भी ‘गुलशन’।
ज़माने की रवीश का जो समझते हैं इशारा कम।।

आईना ए गुलशन..80…गुलशन ख़ैराबादी

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