उर्दू सब के ज़हनों दिल पर छाई है। Urdu Shayari Gulshan Khairabadi

Urdu Shayari by Gulshan Khairabadi  
    

दुआ पेशे खिदमत है  

मेरे   मौला तू  ये  करम  कर दे ।
सहने गुलशन में ताज़गी भर दे  ।।

मैं भी उड़ता फिरुँ बलन्दी पर ।
हौसलों का मुझे वो शहपर दे  ।।

मैं  जलाऊँगा   हक़  की राहों में  ।
तू    चराग़ों   में  रौशनी   भर दे  ।।

मीरो  ग़ालिब   का दर्द दे मुझको   ।
मेरी   ग़ज़लों को  मोतबर  कर दे  ।।

बेटियाँ पढ़ के सब की आलिम हों ।
ऐ   खुदा  रौशनी   ये  घर  घर  दे  ।।

ऐ खुदा उनके ग़म   मुझे दे कर  ।
उनके दामन में हर खुशी भर दे ।।

आज उर्दू पढ़ें सभी ,गुलशन , ।
ऐसी तौफ़ीक़ तू अता कर दे   ।।
गुलशन  ख़ैराबादी

        
ग़ज़ल
उर्दू सब के ज़हनो दिल पर छाई है ।
इसने लोगों की तौक़ीर बढ़ाई है    ।।

लोग जिसे संगीत का जादू कहते हैं ।
उर्दू  की  ग़ज़लों  में  वो शहनाई  है ।।

     ग़ज़ल पेशे खिदमत है


टूट  रहा  है अंग-अंग  पुरवाई है  ।
ऐसे में फिर याद तुम्हारी आई है  ।।

झील सी तेरी आंखों में गहराई है  ।
और बहुत ये मौसम भी हरजाई है  ।।

सूना  सूना घर आंगन है बिन तेरे  ।
सूनी-सूनी लगती  हर  शहनाई  है ।।

जो  अपने  थे वो  लगते  हैं गैर हमें  ।
वक्त़ पड़ा तो बात समझ में आई है ।।

सब्रो  क़रार उसी ने लूटा  है  मेरा ।
नाम अगर लेता हूं तो रुसवाई है ।।

रौन्द रहा  है  पैरों से  तस्वीर मेरी  ।
मेरा दुश्मन आज मेरा ही भाई है ।।

मैं रोया तो भीग गया मां का आंचल ।
ममता  में  देखो  कितनी  गहराई  है  ।।

शफ़्क़तऔर मोहब्बत अपना हैै शेवा ।
राह  यही  अब   गैरों  ने  अपनाई  है ।।

शेर कहो तुम सोच समझकर ऐ ,गुलशन, ।
पहले  देखो  बात  में  कुछ  गहराई    है    ।।

गुलशन ख़ैराबादी

ग़ज़ल

कोई पत्थर कभी भगवान भी हो सकता है ।
दो घड़ी दिल में ये मेहमान भी हो सकता है ।।

उसके  दिल  में  कभी  ईमान  भी हो सकता है ।
कलमा पढ़ कर वो मुसलमान भी हो सकता है।।

मांग  बैठा  है  मुहब्बत  से  अगर  दिल  तेरा ।
दिल-ए-नादाँ वो तेरी जान भी हो सकता है।।

फैज़ हासिल हो अगर तुमको वही हक़ है किताब
हाथ  में  गीता  है  कुरआन  भी  हो  सकता  है।।

जान लो दोस्त यही गर्म हवा का झोंका ।
देखते  देखते  तूफ़ान भी हो सकता है ।।

हमने सोची है हर इक बात मगर ये तो नहीं।
एक दिन  आदमी शैतान भी हो सकता है।।

मैं उसे दिल में बिठा लूँ तो अजब क्या इसमें।
दर पे आया है वो मेहमान भी हो सकता है।।

एक रोटी के लिए आज का काना दज्जाल।
मांग ले  तुम  से वो ईमान भी हो सकता है।।

शेर कहना है तो फिर मश्क़े सुख़न जारी रख ।
तू  कभी  साहिबे  दीवान  भी  हो  सकता है ।।

उसकी ये मेहरो अता ग़म के सिवा ऐ “गुलशन”।

तेरी ख़ुशहाली  का सामान  भी  हो सकता है।।

गुलशन खैराबादी

ग़ज़ल

मिल गया भाई अगर अपना किसी दुश्मन के साथ ।
सानेहा गुज़रेगा वो गुज़रा था जो रावन के साथ ।।

साँप  का मंन्तर  अगर  आता  नहीं है  दोस्तो ।
खेलना अच्छा नहीं है आपका नागन के साथ।।

लोग  समझे  अब्र   का टुकड़ा   कोई    सूरज  पे  है  ।
तुमने काली लट जो लटकाली रूख़े रौशन के साथ ।।

आईना  तो  देखने  की  चीज़  है  ये  जान  लो।
नाज़नी खिलवाड़ क्यों करती हो तुम दर्पन के साथ।।।

उनसे  हम  भी  चाहते हैं रिश्तये दिल जोड़ना।
जो भी खेले हैं हमारे  दोस्तों बचपन के साथ।।

शाख  से  झूलों का रिश्ता  जिस तरह  है  दोस्तो।
मेरी आंखों का ताल्लुक भी है यूँ सावन के साथ।।

ले  न   पाया  अपने  बच्चों  के  लिए  कपड़े  ग़रीब।
फ़ासला खुशियों का कैसे हो गया निर्धन के साथ ।।

याद   आयेंगी   यक़ीनन   बेटियां   उस   दिन   तुझे।
छोड़कर जिस दिन चली जायेंगी वो साजन के साथ।।

क्या  तअज्जुब  चौंकना  कैसा  बतायें  तो  हुज़ूर   ।
गुल अगर होंगे तो होंगे ख़ार भी “गुलशन” के साथ ।।
गुलशन ख़ैराबादी
                     

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